राजस्थान न्यूज़: खैरथल। नगर परिषद चुनाव के नतीजे आने के बाद खैरथल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। कांग्रेस से सभापति पद के संभावित दावेदारों में शामिल रहे पूर्व नेता प्रतिपक्ष विक्रम चौधरी ‘विक्की’ ने भाजपा का दामन थाम लिया है। दिल्ली में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर चौधरी की भाजपा में एंट्री हुई। उनके साथ कई निर्वाचित पार्षदों के भी भाजपा खेमे में आने की खबर है, जिससे नगर परिषद में बोर्ड गठन का संख्या गणित बदल गया है।खैरथल नगर परिषद में कुल 45 वार्ड हैं। चुनाव परिणाम में कांग्रेस ने 20, भाजपा ने 8 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 17 वार्डों में जीत दर्ज की थी। बोर्ड के लिए 23 पार्षदों का समर्थन आवश्यक है। चुनाव परिणाम के तुरंत बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई थी, लेकिन किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। दिल्ली पहुंचकर भाजपा में शामिल हुए विक्रम चौधरी विक्रम चौधरी की भाजपा में एंट्री दिल्ली में हुई। सामने आई रिपोर्टों के अनुसार केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने उनका पार्टी में स्वागत किया। चौधरी इससे पहले खैरथल की स्थानीय कांग्रेस राजनीति में सक्रिय रहे हैं और नगर निकाय में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभा चुके हैं। इस बार उन्हें कांग्रेस की ओर से सभापति पद के संभावित चेहरों में गिना जा रहा था। पार्टी बदलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव में कांग्रेस 20 पार्षदों के साथ सबसे बड़ा दल बनी थी और उसे बोर्ड बनाने के लिए केवल तीन अतिरिक्त पार्षदों का समर्थन चाहिए था। अब चौधरी के भाजपा में शामिल होने तथा उनके साथ अन्य पार्षदों के जाने की खबर ने राजनीतिक समीकरण को नए सिरे से खड़ा कर दिया है। 11 पार्षदों को लेकर रिपोर्टों में अलग-अलग विवरण चौधरी के साथ कितने पार्षद भाजपा में आए हैं, इसे लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में थोड़ा अंतर है। एक रिपोर्ट में विक्रम चौधरी के अलावा 11 अन्य पार्षदों के भाजपा में जाने का दावा किया गया है और इनमें पांच से छह कांग्रेस पार्षद बताए गए हैं, हालांकि उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। दूसरी रिपोर्टों में चौधरी सहित 11 पार्षदों के भाजपा खेमे में आने की बात कही गई है। इसलिए बोर्ड के चुनाव से पहले वास्तविक दलीय संख्या संबंधित पार्षदों की औपचारिक स्थिति से ही स्पष्ट होगी।यदि कांग्रेस के कुछ निर्वाचित पार्षद वास्तव में भाजपा के साथ चले गए हैं और कुछ निर्दलीयों ने भी भाजपा का समर्थन किया है, तो मूल चुनाव परिणाम में बने 20-8-17 के समीकरण में महत्वपूर्ण बदलाव आएगा। लेकिन सभापति का अंतिम फैसला निर्वाचित पार्षदों की मतदान प्रक्रिया से ही होगा। चुनाव में कांग्रेस 20 सीटों के साथ बनी थी सबसे बड़ी पार्टी खैरथल नगर परिषद में मतगणना पूरी होने के बाद कांग्रेस ने 20 वार्ड जीते थे। भाजपा को आठ सीटें मिलीं, जबकि 17 निर्दलीय जीतकर आए। यानी निर्दलीयों की संख्या भी किसी एक बड़े दल की तुलना में काफी महत्वपूर्ण थी।कारण था कि चुनाव परिणाम आने के साथ ही निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बोर्ड गठन में महत्वपूर्ण हो गई थी। कांग्रेस को बहुमत तक पहुंचने के लिए तीन अतिरिक्त मत चाहिए थे, जबकि भाजपा को अपने मूल आठ निर्वाचित पार्षदों के अतिरिक्त काफी समर्थन जुटाना था। अब विक्रम चौधरी के भाजपा में जाने के बाद दोनों राजनीतिक दलों की रणनीति बदलना तय है। निर्दलीयों के साथ-साथ दलों के टिकट पर जीते पार्षदों का रुख भी सभापति चुनाव तक महत्वपूर्ण रहेगा। कांग्रेस जिलाध्यक्ष बोले— पार्षदों से संपर्क की कोशिश खैरथल-तिजारा कांग्रेस जिलाध्यक्ष बलराम यादव ने विक्रम चौधरी के भाजपा में शामिल होने की जानकारी मिलने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि चौधरी से तत्काल संपर्क नहीं हो पाया और कांग्रेस अपने निर्वाचित पार्षदों की स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के कई पार्षद एक साथ रखे गए हैं। कांग्रेस के सामने अब चुनौती अपने निर्वाचित पार्षदों को एकजुट रखने की है। वहीं भाजपा उन पार्षदों के समर्थन को औपचारिक रूप देने की कोशिश करेगी, जिनके उसके साथ आने का दावा किया जा रहा है। सभापति चुनाव तक जारी रहेगा संख्या का खेल खैरथल में वर्तमान राजनीतिक गतिविधि का केंद्र अब सभापति पद है। 45 सदस्यीय परिषद में 23 मतों का आंकड़ा निर्णायक होगा। चुनाव नतीजे और उसके बाद हुए दल परिवर्तन अलग-अलग चरण हैं, इसलिए किसी दल का बोर्ड बनना अभी औपचारिक मतदान से पहले तय नहीं माना जा सकता।राजस्थान के कई नगरीय निकायों की तरह खैरथल में भी निर्दलीय पार्षद बड़ी संख्या में निर्वाचित हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में राजनीतिक संपर्क और पार्षदों की खेमाबंदी जारी रहने की संभावना है। अंतिम तस्वीर सभापति चुनाव के समय पार्षदों के वास्तविक समर्थन और मतदान से स्पष्ट होगी।
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राजस्थान न्यूज़: जयपुर। जयपुर नगर निगम चुनाव में भाजपा के बहुमत का आंकड़ा पार करने के बाद अब पार्टी के भीतर मेयर और डिप्टी मेयर के नाम को लेकर मंथन तेज हो गया है। अभी 150 में से 146 वार्डों के परिणाम घोषित हुए हैं, जिनमें भाजपा 78 सीटें जीत चुकी है। कांग्रेस के खाते में 53 और निर्दलीयों के पास 15 सीटें हैं। चार वार्डों में EVM संबंधी तकनीकी समस्या के कारण पुनर्मतदान कराया जा रहा है, लेकिन 76 के बहुमत के आंकड़े को भाजपा पहले ही पार कर चुकी है। पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं में इस बार मेयर पद के लिए वैश्य समाज, विशेष रूप से जैन समुदाय से किसी नेता को मौका देने का सामाजिक समीकरण सामने आया है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में सुनील कोठारी और पुनीत कर्णावट के नाम प्रमुखता से चर्चा में बताए गए हैं। हालांकि भाजपा ने अभी आधिकारिक रूप से मेयर प्रत्याशी घोषित नहीं किया है और अंतिम फैसला प्रदेश नेतृत्व को करना है। सुनील कोठारी के नाम पर क्यों हो रही चर्चा सुनील कोठारी वार्ड नंबर 112 से भाजपा के निर्वाचित पार्षद हैं। वह पार्टी संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और प्रदेश उपाध्यक्ष तथा जयपुर शहर भाजपा अध्यक्ष जैसी जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। चुनाव से पहले भी भाजपा ने वार्ड 112 से उन पर भरोसा जताया था और उन्होंने यहां जीत दर्ज की। पार्टी के भीतर चल रही सोशल इंजीनियरिंग की चर्चाओं में उनका नाम वैश्य-जैन प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ मीडिया रिपोर्टों ने उन्हें मेयर पद की चर्चाओं में आगे बताया है, लेकिन इसे भाजपा का आधिकारिक निर्णय नहीं माना जा सकता। पुनीत कर्णावट भी चर्चा में पूर्व डिप्टी मेयर पुनीत कर्णावट भी मेयर पद को लेकर चल रही आंतरिक चर्चा का हिस्सा हैं। भाजपा ने उन्हें वार्ड नंबर 76 से उम्मीदवार बनाया था। पार्टी संगठन और नगर निगम की राजनीति का अनुभव उनके पक्ष में चर्चा का एक प्रमुख कारण बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों में उन्हें मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के निकट माने जाने वाले नेताओं में भी शामिल किया गया है, हालांकि राजनीतिक निकटता संबंधी ऐसे आकलन संबंधित रिपोर्टों के हैं। टिकट वितरण के दौरान पुनीत कर्णावट के वार्ड को लेकर स्थानीय स्तर पर खींचतान की खबरें भी सामने आई थीं। इसी कारण मेयर प्रत्याशी के अंतिम चयन में संगठन, स्थानीय विधायक और प्रदेश नेतृत्व के बीच संतुलन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विधायकों की राय भी बनी चर्चा का विषय भाजपा के अंदर एक और दिलचस्प राजनीतिक चर्चा यह है कि जयपुर शहर के कुछ विधायक चाहते हैं कि मेयर उनके अपने विधानसभा क्षेत्र से न बनाया जाए और उस विधानसभा क्षेत्र को प्राथमिकता मिले जहां भाजपा का विधायक नहीं है। इस संबंध में पार्टी स्तर पर आधिकारिक प्रस्ताव सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन स्थानीय राजनीतिक रिपोर्टों में इस तरह की राय सामने आने की बात कही गई है। इसे लेकर यह राजनीतिक व्याख्या भी की जा रही है कि विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र में दूसरा बड़ा सत्ता केंद्र खड़ा होने से बचना चाहते हैं। हालांकि यह केवल एक राजनीतिक आकलन है; संबंधित विधायकों ने सार्वजनिक रूप से ऐसा कारण नहीं बताया है। डिप्टी मेयर के लिए ब्राह्मण चेहरे पर भी मंथन यदि मेयर पद के लिए वैश्य या जैन समाज से प्रत्याशी चुना जाता है तो डिप्टी मेयर के लिए ब्राह्मण समाज से किसी पार्षद को अवसर दिए जाने की चर्चा है। जयपुर शहर में भाजपा के कई ब्राह्मण पार्षद चुनाव जीते हैं और पार्टी में सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखने को लेकर अलग-अलग विकल्पों पर विचार चल रहा है। इस चर्चा में शैलेन्द्र भार्गव का नाम भी सामने आया है। वह वार्ड नंबर 43 से निर्वाचित हुए हैं और भाजपा के जयपुर शहर अध्यक्ष रह चुके हैं। संगठन में लंबे अनुभव के कारण मीडिया रिपोर्टों में उनका नाम मेयर और डिप्टी मेयर दोनों पदों की चर्चाओं में शामिल किया गया है। प्रतिभा शर्मा और शशि प्रकाश शर्मा के नाम भी चर्चा में भाजपा यदि डिप्टी मेयर के लिए किसी नए या अपेक्षाकृत युवा चेहरे पर विचार करती है तो प्रतिभा शर्मा और शशि प्रकाश शर्मा के नाम भी स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में हैं। प्रतिभा शर्मा वार्ड नंबर 87 और शशि प्रकाश शर्मा वार्ड नंबर 97 से भाजपा उम्मीदवार थे और चुनाव परिणाम में दोनों के नाम विजेताओं की सूची में दर्ज हैं। हालांकि पार्टी ने इनमें से किसी भी नाम पर आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है। इसलिए फिलहाल इन सभी नामों को संभावित दावेदारी अथवा आंतरिक चर्चा के स्तर पर ही देखा जाना चाहिए। राजपूत समाज की ओर से भी प्रतिनिधित्व की मांग डिप्टी मेयर को लेकर राजपूत समाज से जुड़े नेताओं की ओर से भी प्रतिनिधित्व की मांग की चर्चा है। पार्टी के सामने सवाल यह है कि मेयर और डिप्टी मेयर के दो पदों के जरिए शहर के विभिन्न सामाजिक समूहों को किस तरह प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसी समीकरण में मूल OBC समुदाय से किसी पार्षद को डिप्टी मेयर बनाए जाने का विकल्प भी आंतरिक चर्चाओं में बताया जा रहा है। हालांकि उम्मीदवार का चयन केवल जातीय समीकरण से तय होगा, ऐसा कोई आधिकारिक संकेत भाजपा नेतृत्व की ओर से नहीं दिया गया है। बाड़ेबंदी में पार्षदों से रायशुमारी निकाय चुनाव परिणाम से पहले ही भाजपा ने अपने कई प्रत्याशियों को एक साथ रखने की व्यवस्था की थी। पार्टी ने इसे प्रशिक्षण और संगठनात्मक समन्वय से जोड़ा, जबकि राजनीतिक तौर पर इसे बाड़ेबंदी के रूप में देखा गया। परिणाम आने के बाद भी निर्वाचित पार्षदों के साथ मेयर और अन्य पदों को लेकर रायशुमारी किए जाने की खबर है।प्रदेश नेतृत्व के सामने अब संगठनात्मक अनुभव, सामाजिक प्रतिनिधित्व, स्थानीय विधायकों की राय और निर्वाचित पार्षदों के बीच स्वीकार्यता जैसे कई पहलू हैं। इसी आधार पर अंतिम उम्मीदवार का नाम तय होने की संभावना है। जयपुर में मेयर चुनाव का कार्यक्रम फिलहाल टला जयपुर में मेयर चुनाव की तारीख को लेकर भी महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। वार्ड 9, 18, 25 और 34 के पांच बूथों पर पुनर्मतदान के कारण राज्य निर्वाचन आयोग ने जयपुर नगर निगम के मेयर और डिप्टी मेयर चुनाव की पूर्व निर्धारित प्रक्रिया स्थगित कर दी है। इन वार्डों के वोटों की गिनती 17 सितंबर को पूरी होने के बाद आयोग संशोधित चुनाव कार्यक्रम जारी करेगा। इसलिए भाजपा के पास उम्मीदवार के चयन के लिए अब कुछ अतिरिक्त समय है। चार लंबित वार्डों का परिणाम भाजपा के मौजूदा बहुमत को समाप्त नहीं करता, लेकिन सभी 150 पार्षदों की अंतिम तस्वीर साफ होने के बाद ही मेयर चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।फिलहाल सुनील कोठारी, पुनीत कर्णावट, शैलेन्द्र भार्गव और अन्य नाम पार्टी की आंतरिक चर्चाओं और मीडिया रिपोर्टों में हैं। अंतिम उम्मीदवार कौन होगा, यह भाजपा नेतृत्व की औपचारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा।
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राजस्थान न्यूज़: उदयपुर। नगर निगम चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद मेयर पद को लेकर पार्टी के भीतर चली लंबी माथापच्ची बुधवार को खत्म हो गई। भाजपा ने पूर्व उपमहापौर और वार्ड नंबर 24 से निर्वाचित पार्षद पारस सिंघवी को उदयपुर मेयर पद का प्रत्याशी बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस ने वार्ड नंबर 17 से निर्वाचित पूनम कुंवर राठौड़ को मैदान में उतारा है। दोनों दलों के प्रत्याशी सामने आने के बाद अब उदयपुर नगर निगम के मेयर चुनाव की तस्वीर साफ हो गई है। भाजपा ने नगर निगम की 80 सीटों में से 53 वार्ड जीते हैं, जबकि कांग्रेस के 23 पार्षद निर्वाचित हुए। तीन निर्दलीय और एक अन्य दल का पार्षद भी निगम पहुंचा है। 41 के बहुमत के आंकड़े से भाजपा काफी आगे है। पारस सिंघवी स्वयं वार्ड 24 से 2,449 मत हासिल कर 1,680 वोट के अंतर से चुनाव जीते हैं। अंतिम समय तक दिनेश भट्ट और प्रमोद सामर के नाम पर चला मंथन मेयर पद के प्रत्याशी को लेकर भाजपा में अंतिम समय तक स्थिति साफ नहीं थी। मंगलवार से बुधवार दोपहर तक पार्टी में पूर्व शहर अध्यक्ष दिनेश भट्ट और वरिष्ठ नेता प्रमोद सामर के नाम प्रमुखता से चर्चा में रहे। पार्टी ने अपने 53 नवनिर्वाचित पार्षदों से पर्ची पर तीन-तीन पसंदीदा नाम लिखवाकर राय भी ली थी। पारस सिंघवी, प्रमोद सामर, दिनेश भट्ट और कुछ अन्य नाम इस रायशुमारी में चर्चा में थे। स्थानीय राजनीतिक रिपोर्टों के मुताबिक भट्ट और सामर के नाम पर अलग-अलग पक्षों की सहमति नहीं बन पाने के बाद तीसरे विकल्प के रूप में पारस सिंघवी के नाम पर मंथन तेज हुआ। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े पदाधिकारियों की मध्यस्थता के बाद सिंघवी के नाम पर सहमति बनी। भाजपा या आरएसएस की ओर से इस प्रक्रिया का विस्तृत आधिकारिक ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। समर्थकों के साथ निगम पहुंचे पारस सिंघवी पारस सिंघवी समर्थकों और भाजपा नेताओं के साथ नगर निगम पहुंचे और मेयर पद के लिए नामांकन प्रक्रिया पूरी की। उनके साथ शहर भाजपा जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़, राज्यसभा सांसद चुन्नीलाल गरासिया, पूर्व मेयर जी.एस. टांक, रजनी डांगी, चंद्रसिंह कोठारी और पूर्व सभापति युधिष्ठिर कुमावत सहित कई स्थानीय नेता मौजूद रहे। पार्षद पंकज बोराणा उनके प्रस्तावक बने। नामांकन के लिए जाते समय सिंघवी भावुक भी नजर आए और पार्टी कार्यकर्ताओं तथा साथियों से मिले। लंबे समय से नगर निगम की राजनीति में सक्रिय सिंघवी पूर्व में उपमहापौर की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इस बार भाजपा ने उन्हें वार्ड 24 से चुनाव मैदान में उतारा था और उन्होंने बड़ी बढ़त से जीत दर्ज की। डिप्टी मेयर को लेकर अब नई खींचतान की संभावना पारस सिंघवी के मेयर प्रत्याशी बनने के बाद भाजपा के भीतर अब डिप्टी मेयर पद को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। स्थानीय राजनीतिक रिपोर्टों के अनुसार दिनेश भट्ट के नाम पर डिप्टी मेयर पद का विकल्प चर्चा में आया है। यदि उनके नाम पर सहमति नहीं बनती है तो अशोक नागदा और जतिन श्रीमाली जैसे नामों पर भी विचार होने की बात कही जा रही है। हालांकि भाजपा ने डिप्टी मेयर पद के लिए अभी कोई आधिकारिक प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। डिप्टी मेयर का चुनाव 22 सितंबर को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होना है, इसलिए पार्टी के पास इस पद के लिए सामाजिक और संगठनात्मक समीकरण तय करने का समय है। शहर विधायक और संगठन के बीच अलग-अलग नामों की चर्चा मेयर प्रत्याशी के चयन से पहले भाजपा में अलग-अलग नेताओं की पसंद को लेकर भी राजनीतिक चर्चा रही। रिपोर्टों के मुताबिक शहर विधायक ताराचंद जैन के स्तर पर दिनेश भट्ट के नाम को लेकर सकारात्मक राय थी, जबकि संगठन के कुछ पदाधिकारी दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहे थे। प्रमोद सामर का नाम भी प्रदेश नेतृत्व के सामने प्रमुख दावेदार के रूप में पहुंचा था। इसी मतभेद के कारण पार्टी नेतृत्व ने अंतिम समय तक घोषणा नहीं की और वैकल्पिक नामों पर भी विचार किया। पारस सिंघवी के अलावा पंकज बोराणा, अशोक नागदा, जतिन श्रीमाली और अन्य नेताओं के नाम भी अलग-अलग चरणों में चर्चा में आए। कांग्रेस ने पूनम कुंवर को मैदान में उतारा कांग्रेस की ओर से शहर जिलाध्यक्ष फतेहसिंह राठौड़ की पत्नी डॉ. पूनम कुंवर राठौड़ को मेयर प्रत्याशी बनाया गया है। पूनम कुंवर वार्ड नंबर 17 से कांग्रेस के टिकट पर पार्षद चुनी गई हैं। कांग्रेस ने बुधवार को उनके नाम पर मुहर लगाकर नामांकन कराया। इससे पहले कांग्रेस में पूनम कुंवर के अलावा हितांशी शर्मा, अरुण टांक और कुछ अन्य निर्वाचित पार्षदों के नाम भी संभावित प्रत्याशी के रूप में चर्चा में थे। अंतिम चरण में पार्टी ने पूनम कुंवर को उम्मीदवार बनाया। भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत उदयपुर में मेयर चुनाव का संख्या गणित भाजपा के पक्ष में स्पष्ट है। निगम की कुल 80 सीटों में भाजपा के 53 पार्षद हैं और मेयर चुनने के लिए 41 वोट पर्याप्त हैं। कांग्रेस के 23 पार्षद हैं, जबकि तीन निर्दलीय और एक अन्य पार्षद है। इसलिए मेयर चुनाव में भाजपा को अपने ही निर्वाचित पार्षदों के मत एकजुट रखने की जरूरत होगी। हालांकि मेयर का अंतिम निर्वाचन पार्षदों के मतदान से ही होगा। प्रत्याशी घोषित होना और बहुमत संख्या होना अलग चरण हैं; औपचारिक परिणाम मतदान और मतगणना के बाद घोषित किया जाएगा। 21 सितंबर को होगा मेयर चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग के कार्यक्रम के अनुसार मेयर पद के लिए नामांकन की अंतिम तारीख 16 सितंबर है। 17 सितंबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 18 सितंबर दोपहर 3 बजे तक उम्मीदवार नाम वापस ले सकेंगे। मेयर पद के लिए मतदान 21 सितंबर को सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक होगा और इसके तुरंत बाद मतगणना कर परिणाम घोषित किया जाएगा। डिप्टी मेयर का चुनाव अगले दिन 22 सितंबर को होगा। इस तरह उदयपुर में अब मुकाबला भाजपा के पारस सिंघवी और कांग्रेस की पूनम कुंवर के बीच है। भाजपा के भीतर कई दिनों से चल रहा प्रत्याशी चयन का विवाद फिलहाल सिंघवी के नाम के साथ समाप्त हो गया है, जबकि अगला संगठनात्मक मंथन डिप्टी मेयर पद को लेकर होने की संभावना है।
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अजमेर न्यूज़: 1100 वर्ष पूर्व स्थापित मंदिर की बड़ी है मान्यता, दूर दराज से पहुंचते हैं हजारों श्रद्धालु
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अजमेर न्यूज़: 1968 से कस्बे की धार्मिक संस्था श्री ब्रह्म पुष्कर सेवा संघ कर रही है इस अनूठी परंपरा का निर्वहन
Read more 31st Aug 2022
अजमेर न्यूज़: 10 टीमें 8 - 8 वार्डो में जाकर घूम रही गायों का करेंगीं प्राथमिक उपचार
Read more 31st Aug 2022
राष्ट्रीय न्यूज़: गुरुग्राम के गोल्फ कोर्स रोड पर महिला बाइकर सिया को कार से टक्कर मारने के मामले में पुलिस ने आरोपी कल्याण बैंसला को राजस्थान के दौसा से गिरफ्तार किया है। सीसीटीवी फुटेज की जांच के बाद एफआईआर में हत्या के प्रयास की धारा भी जोड़ी गई है। महिला ने जानबूझकर टक्कर मारने का आरोप लगाया है, जबकि आरोपी ने इसे दुर्घटना बताया है। गुरुग्राम के चर्चित महिला बाइकर मामले में पुलिस ने मंगलवार, 15 सितंबर को आरोपी कल्याण बैंसला को दौसा से गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उसे गुरुग्राम लाए जाने की जानकारी दी। गोल्फ कोर्स रोड पर हुई घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेकर सेक्टर-56 थाने में मामला दर्ज किया था। सीसीटीवी की जांच के बाद बढ़ाई धारा पुलिस के मुताबिक, जांच के दौरान सीसीटीवी फुटेज का विश्लेषण करने के बाद मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 109, यानी हत्या के प्रयास का आरोप जोड़ा गया। शुरुआत में लापरवाही से वाहन चलाने और दूसरों की जान को खतरे में डालने से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ था। महिला का आरोप—पीछा किया, फिर बाइक को टक्कर मारी सिया के अनुसार, वह रविवार तड़के अपने साथियों के साथ बाइक चला रही थीं। आरोप है कि सफेद कार का चालक उनके करीब गाड़ी चलाने लगा और बार-बार रुकने के इशारे किए। उन्होंने चालक से दूरी बनाए रखने को कहा, लेकिन इसके बाद कार ने बाइक को टक्कर मार दी। सिया ने कार सवारों के नशे में होने का भी आरोप लगाया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि टक्कर अनजाने में लगी थी तो चालक उनकी मदद करने के लिए क्यों नहीं रुका। आरोपी का दावा—जानबूझकर नहीं मारी टक्कर दिए गए बयान में बैंसला ने टक्कर होने की बात स्वीकार की, लेकिन जानबूझकर ऐसा करने से इनकार किया। उसका दावा है कि वाहन पर नियंत्रण खोने से दुर्घटना हुई और मौके पर मौजूद लोगों से मारपीट के डर से वह वहाँ से चला गया। आरोपी के वकील ने भी घटना को दुर्घटना बताते हुए महिला बाइकर की ड्राइविंग पर सवाल उठाए हैं। ये बचाव पक्ष के दावे हैं; घटना की परिस्थितियों और जिम्मेदारी की जांच पुलिस कर रही है। पुलिस पूछताछ के लिए मांगेगी रिमांड गुरुग्राम के डीसीपी ईस्ट संदीप कुमार के मुताबिक, आरोपी को अदालत में पेश कर आगे की पूछताछ के लिए रिमांड मांगी जाएगी। पुलिस घटना के समय उसके साथ मौजूद अन्य व्यक्ति की भूमिका की भी जांच कर रही है।
Read more 16th Sep 2026
राष्ट्रीय न्यूज़: नई दिल्ली। यूपीआई से भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों के लिए केंद्र सरकार ने डिजिटल पेमेंट पर शुल्क को लेकर स्थिति स्पष्ट कर दी है। वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग ने 14 सितंबर 2026 को अधिसूचना जारी कर कहा है कि ₹2,000 तक के UPI ट्रांजैक्शन पर बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर भुगतान करने वाले या भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्ति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं ले सकेंगे। यह व्यवस्था Payment and Settlement Systems Act, 2007 की धारा 10A के तहत अधिसूचित की गई है। नई अधिसूचना ऐसे समय आई है जब अगस्त में संसद द्वारा Taxation and Other Laws (Amendment) Act, 2026 पारित किए जाने के बाद यह चर्चा तेज हो गई थी कि क्या सरकार UPI पर शुल्क लगाने की तैयारी कर रही है। कानून में किए गए बदलाव ने सरकार को यह तय करने का अधिकार दिया कि किन इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट माध्यमों को अनिवार्य रूप से शुल्क-मुक्त रखा जाएगा। अब सरकार ने ₹2,000 तक के UPI लेनदेन को स्पष्ट रूप से इस सुरक्षा के दायरे में शामिल कर दिया है। ₹2,000 से ज्यादा के UPI पेमेंट पर क्या अब चार्ज लगेगा? इस पूरे बदलाव में आम उपभोक्ता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ₹2,000 से अधिक का UPI भुगतान करते ही अपने आप कोई शुल्क लागू नहीं हो गया है। 14 सितंबर की अधिसूचना सिर्फ इतनी बात कानूनी रूप से सुनिश्चित करती है कि ₹2,000 तक के UPI लेनदेन पर किसी तरह की फीस नहीं लगाई जा सकती। ₹2,000 से अधिक के भुगतान के लिए अधिसूचना में कोई नया चार्ज या दर घोषित नहीं की गई है। सरकार इससे पहले 8 अगस्त को भी स्पष्ट कर चुकी है कि UPI का इस्तेमाल करने वाले सामान्य उपभोक्ताओं से ट्रांजैक्शन फीस लेने का प्रस्ताव नहीं है और सभी Person-to-Person यानी P2P भुगतान मुफ्त बने रहेंगे। भविष्य में यदि Merchant Discount Rate यानी MDR लागू किया भी जाता है, तो वह केवल कुछ चुनिंदा और निर्धारित सीमा से ऊपर के मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर हो सकता है। इसका अंतिम ढांचा अभी तय नहीं हुआ है। इसका सरल अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपने दोस्त, रिश्तेदार या किसी अन्य व्यक्ति को UPI से ₹5,000, ₹10,000 या उससे अधिक भेजता है, तो सरकार की घोषित नीति के अनुसार P2P ट्रांजैक्शन मुफ्त बने रहने हैं। चर्चा मुख्य रूप से बड़े merchant payments यानी दुकानदार या व्यवसाय को किए जाने वाले भुगतान पर संभावित MDR की है, न कि हर ₹2,000 से अधिक UPI ट्रांजैक्शन पर ग्राहक से शुल्क वसूलने ग्राहक से नहीं, बड़े व्यापारियों पर हो सकता है MDR सरकार का संकेत है कि भविष्य में UPI नेटवर्क को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए सीमित श्रेणी के बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर नाममात्र MDR लगाया जा सकता है। MDR वह शुल्क होता है जो आमतौर पर व्यापारी द्वारा डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले भुगतान व्यवस्था से जुड़े संस्थानों को दिया जाता है। वित्त मंत्रालय ने पहले ही स्पष्ट किया है कि यदि ऐसा MDR लाया जाता है तो यह सभी UPI लेनदेन पर एक समान नहीं होगा। केवल एक निश्चित सीमा से ऊपर और कुछ खास मर्चेंट श्रेणियों पर इसे लागू करने पर विचार किया जा सकता है। इसकी दर और किन व्यापारियों पर इसे लागू किया जाएगा, इस संबंध में अभी अंतिम फैसला घोषित नहीं हुआ है। इसलिए यदि भविष्य में बड़े मर्चेंट UPI भुगतान पर MDR लागू होता भी है, तो इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि ग्राहक के खाते से अतिरिक्त पैसा कटे। MDR की प्रकृति सामान्यतः व्यापारी और भुगतान प्रणाली के बीच शुल्क की होती है। हालांकि अंतिम व्यवस्था सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि उसका व्यावहारिक असर व्यापारियों और ग्राहकों पर किस तरह पड़ेगा। RuPay डेबिट कार्ड को लेकर अधिसूचना में महत्वपूर्ण अंतर 14 सितंबर की सरकारी अधिसूचना में एक महत्वपूर्ण तकनीकी बात भी है। इसमें दो इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड सूचीबद्ध हैं—पहला RuPay-powered Debit Card और दूसरा UPI transactions up to ₹2,000। अधिसूचना के मूल शब्दों में ₹2,000 की सीमा केवल UPI के साथ लिखी गई है; RuPay डेबिट कार्ड के लिए ऐसी सीमा अलग से दर्ज नहीं है। इसलिए अधिसूचना के शाब्दिक पाठ के मुताबिक RuPay डेबिट कार्ड को भी नो-चार्ज श्रेणी में रखा गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन अधिसूचित भुगतान माध्यमों के जरिए भुगतान करने वाले या भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्ति से बैंक अथवा सिस्टम प्रोवाइडर कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं वसूल सकता। आखिर सरकार ने कानून क्यों बदला? भारत में UPI का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षों में बेहद तेजी से बढ़ा है। अकेले जुलाई 2026 में UPI के जरिए करीब 2,366 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल कीमत लगभग ₹29.9 लाख करोड़ रही। सरकार का कहना है कि इतने बड़े डिजिटल भुगतान नेटवर्क को लगातार साइबर सुरक्षा, फ्रॉड प्रिवेंशन और तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश की जरूरत पड़ती है। इसी वजह से कानून में किया गया बदलाव सरकार को भविष्य में ऐसा मॉडल तैयार करने की गुंजाइश देता है जिससे छोटे और रोजमर्रा के डिजिटल भुगतान मुफ्त रहें, लेकिन बड़े व्यावसायिक लेनदेन के जरिए पेमेंट इकोसिस्टम को कुछ आय भी मिल सके।सरकार का कहना है कि किसी भी संभावित MDR का मकसद आम UPI यूजर पर शुल्क लगाना नहीं, बल्कि डिजिटल भुगतान नेटवर्क की दीर्घकालीन वित्तीय और तकनीकी मजबूती सुनिश्चित करना है। आम UPI यूजर पर अभी क्या असर पड़ेगा? फिलहाल सामान्य UPI उपयोगकर्ता के लिए रोजमर्रा के भुगतान में कोई बदलाव नहीं है। ₹50 की चाय, ₹500 की खरीदारी या ₹2,000 तक का कोई भी UPI भुगतान बिना शुल्क के जारी रहेगा। व्यक्ति से व्यक्ति UPI ट्रांसफर भी सरकार की घोषित नीति के मुताबिक मुफ्त रहेंगे। ₹2,000 से अधिक के UPI मर्चेंट भुगतान पर भविष्य में कोई MDR लागू होगा या नहीं, उसकी दर क्या होगी और किन व्यापारियों पर लागू होगा—यह अलग निर्णय से तय होगा। इसलिए अभी यह कहना गलत होगा कि ₹2,001 का UPI पेमेंट करते ही ग्राहक को चार्ज देना पड़ेगा। नए नियम का वास्तविक संदेश यह है कि सरकार ने कम मूल्य वाले UPI भुगतान को अनिवार्य रूप से मुफ्त रखने की कानूनी गारंटी दे दी है, जबकि बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन के लिए भविष्य की फीस व्यवस्था का विकल्प खुला रखा है। एक नजर में नया नियम ₹2,000 तक UPI: बैंक या सिस्टम प्रोवाइडर कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चार्ज नहीं लगा सकते। ₹2,000 से ज्यादा UPI: अभी अपने आप कोई नया शुल्क लागू नहीं हुआ है। P2P UPI: सरकार ने इसे मुफ्त बनाए रखने की बात कही है। बड़े मर्चेंट पेमेंट: भविष्य में सीमित MDR संभव है, लेकिन अभी अंतिम दर या नियम घोषित नहीं। RuPay डेबिट कार्ड: 14 सितंबर की अधिसूचना में इसे भी नो-चार्ज इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड के रूप में अधिसूचित किया गया है।
Read more 15th Sep 2026
गुप्त ध्वनि किरणों के साथ ओशो पर किसने हमला किया?...
गुप्त ध्वनि किरणों के साथ ओशो पर किसने हमला किया?... * ओशो के निजी दंत चिकित्सक देवगेट ओशो की मृत्यु से 4 दिन पहले हुई घटनाओं के बारे में बात करते हैं (शरीर को छोड़कर)... * 15 aजनवरी, 1990 को, मेरे जन्मदिन पर, मुझे शुन्यो से एक संदेश मिला: ओशो चाहते थे कि मैं उनके पेट का एक्स-रे ले। हम दंaत कक्ष में मिले। ओशो का शरीर पतला और बेकार लग रहा था, फिर भी मैंने उसे शक्तिशाली रूप से उपस्थित महसूस किया। मुझे शुन्यो से पता था कि वह हर दिन बीस घंटे से अधिक सो रहा था, हर शाम बुद्ध हॉल में कुछ क़ीमती मिनटों के लिए अपनी शारीरिक ऊर्जा को बचा रहा था। ओशो नेa मुझे बताया कि उसके हमलावरों की आवाज़ से उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया था। उन्होंने कहा कि उनमें से शायद तीन, दो पुरुष और एक महिला, ध्वनि तरंगों पर ध्यानaa केंद्रित करने और अपने शरीर को लक्षित करने के लिए एक विशेष गठन में बैठे थे। यहां भारत में प्राचीन योगिक प्रथाएं हैं जहां लोग कुछ ध्वनियों, कुछ मंत्रों को जानते हैं, जो लोगों को नुक़सान पहुंचाने के लिए ध्वनि को केंद्रित कर सकते हैं। लेकिन मुझ पर हमला करaaने वाले ये लोग भारतीय नहीं हैं। वे वही लोग हैं जिन्होंने अमेरिका में पहले मुझे मारने की कोशिश की थी। वे तब सफल नहीं हो सके, और अब वे जो शुरू किया उसे पूरा कर ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने मुझे बोलने से रोकने के लिए ज़हर की कोशिश की लेकिन मैं जारी रखने में कामयाब रहा। अब, पांच साल बाद वे वापस आ गए हैं। उन्होंने पहले बुद्ध हॉल में अपनी ध्वनि किरणों का उपयोग मेरे दिमाग़ पर हमला करने के लिए किया लेकिन मैं अपने दिमाग़ में नहीं हूं। मैं एक नो-मन हूं और उनकी आवाज़ का बहुत कम प्रभाव था। इसलिए उन्होंने अपनी रणनीति बदल दी, अब वे मेरे शरीर पर हमला कर रहे हैं। मेरे गरीब शरीर को उनकी किरणों से कोई सुरक्षा नहीं है। हर दिन यह कमजोर होता जाता है। वे मुझे मार नहीं सकते लेकिन वे मेरे शरीर को नुक़सान पहुंचा सकते हैं। अभी मेरे जिगर के क्षेत्र में बहुत दर्द हो रहा है। क्या आप इसे एक्स-रे कर सकते हैं? दुख की बात है, मैंने समझाया कि मेरी दंत एक्स-रे मशीन शायद अपर्याप्त थी क्योंकि यह केवल दांतों और जबड़े की छोटी फिल्में ले सकती थी, लेकिन हम कोशिश कर सकते थे। अमृतो को हमारे पास सबसे बड़ी एक्स-रे फ़िल्म मिली, जबकि मैंने इसकी बीम को चौड़ा करने के लिए डेंटल एक्स-रे मशीन के साथ जिग्गल किया। मैंने वह करने की कोशिश की जो ओशो पूछ रहा था। मैंने उसके जिगर के क्षेत्र की एक तस्वीर ली और फिर दंत विकास में बड़ी फ़िल्म विकसित करने में कामयाब रहा टैंक जिसे छोटी इंट्रा-ओरल डेंटल फ़िल्मों के लिए डिज़ाइन किया गया था, लेकिन परिणामी छवि धुंधली और अस्पष्ट थी। यह आख़िरी बार था जब मैंने ओशो को उसके भौतिक शरीर में देखा था। 19 जनवरी को शाम 4:30 बजे थे: मैं अपनी प्रेमिका के साथ अपने कमरे में था जब दरवाजे पर एक ज़रूरी दस्तक हुई। मनीषा, पीला और तनावग्रस्त दिख रही थी, ने पूछा कि क्या वह मेरे कमरे के फ़ोन का उपयोग कर सकती है। मुझे पता था कि वह केवल पूछेगी कि क्या कुछ असामान्य हो रहा है। अस्थायी सचिव के रूप में कार्य करते हुए वह इनर सर्कल के सदस्यों को फ़ोन कर रही थी और उन्हें कृष्णा हाउस में एक असाधारण बैठक में तुरंत आने के लिए कह रही थी। ओशो ने पंद्रह महीने पहले इक्कीस लोगों की एक कम्यून प्रबंधन टीम की स्थापना की थी, इसे इनर सर्कल का नाम दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका काम कम्यून के दिन-प्रतिदिन चलने का प्रबंधन करना था। मैं मूल चयन में नहीं था, लेकिन कुछ महीने बाद मुझे शामिल होने के लिए कहा गया था। फ़ोन करने के बाद, मनीषा ने कहा, “गीट, तुमने सुना कि मैं दूसरों को क्या बता रहा था। बैठक कृष्णा हाउस की छत पर ब्लू रूम में है। क्या आप वहां तुरंत जा सकते हैं?” इससे पहले कि मैं कोई सवाल पूछ पाता, वह जल्दी से गलियारे में चली गई, स्पष्ट रूप से एक और महत्वपूर्ण कार्य में शामिल थी। मैंने दोपहर के अधिकांश समय अजीब तरह से विपुल महसूस किया था। बाहरी मामलों की उथल-पुथल के बावजूद मैं कई दिनों से उत्साहित महसूस कर रहा था। मेरे दिल में ख़ुशी का एक अकथनीय नृत्य था। अंदर से मुझे उत्साह, आनंद महसूस हुआ। ब्लू रूम में पहुंचने पर, मैंने देखा कि अधिकांश इनर सर्कल पहले से ही वहां इकट्ठा हो चुके थे। माहौल तनावपूर्ण और तनावपूर्ण था। मेरा अपना उत्साह जगह से बाहर लग रहा था। मैं बैठ गया और इंतज़ार किया। कुछ मिनटों के बाद जयेश ने अमृतो के साथ प्रवेश किया। यह देखने के लिए संक्षेप में चारों ओर देखते हुए कि हम सभी मौजूद हैं, उन्होंने एक दृढ़, हालांकि शांत आवाज़ में कहा, “मुझे लगता है कि इसे लपेटने का कोई तरीक़ा नहीं है। मैं आपको सीधे बताऊंगा। ओशो ने कुछ समय पहले लगभग 4:45 बजे अपना शरीर छोड़ दिया था दोपहर।” स्तब्ध, मैंने अपनी घड़ी को देखा। शाम के 5:15 बजे थे। उपस्थित दो या तीन लोग रोने लगे। जयेश ने जल्दी से बीच में टोका, “देखो, मुझे तुम्हारी सारी मदद की ज़रूरत है। कृपया अभी तक अलग न हों। मुझे आप सभी की ज़रूरत है कि ओशो के भेजने को उतना ही सुंदर बनाने में मदद करें जितना वह हकदार है। यह आख़िरी चीज है जो हम उसके लिए कर सकते हैं भौतिक शरीर, चलो इसे अद्भुत बनाते हैं। उसने मुझे ठीक से बताया कि वह कैसे चाहता है कि ऐसा हो। उसने मुझे हर चीज के लिए विस्तृत निर्देश दिए, लेकिन मुझे यहां हर किसी की मदद की ज़रूरत है।” जयेश के शब्दों को सुनकर मेरा पहले का उत्साह सदमे में बदल गया था, लेकिन मैंने ओशो को अपने लोगों के साथ अपने अंतिम उत्सव का आनंद लेने में सक्षम बनाने के लिए हमारी मदद के लिए जयेश की अपील को स्पष्ट रूप से सुना। जैसे ही मैंने ब्लू रूम छोड़ा, जयेश ने मुझे बताया कि ओशो ने अनुरोध किया था कि मैं उनके शरीर को जलते हुए घाटों तक ले जाने के लिए एक वाहक बनूं। गतिविधि और भ्रमित भावनाओं के एक धुंध में मुझे याद है कि ओशो के इस अंतिम उपहार के लिए बेहद आभारी महसूस कर रहा था। - स्वामी देवगीत पुस्तक : ओशो - द फर्स्ट बुद्ध इन द डेंटल चेयर अध्याय: 17 अध्याय का नाम: ओशो का अंतिम दंत नाटक: अधिनियम V अंतिम सुनहरी झलक
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