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July 24, 2022
समता भवन में शनिवार को आयोजित धर्मसभा में आचार्य रामेश के शिष्य शासन दीपक विनय मुनि ने प्रवचन देते हुए कहा कि श्रावक को श्रद्धावान होना चाहिए, जिनवाणी पर पूरी श्रद्धा हो। नौ तत्वों पर श्रद्धा हो। श्रावक का अर्थ होता है श्रद्धावान, विवेकवान, क्रियावान। द्रव्य श्रावक वो ही कहलाता है, जो साधु-साध्वियों की सेवा करता है। नौ तत्वों का जानकार है। उपदेश सुनने वाला और जैन धर्म को मानने वाला हो। भाव श्रावक समकित सहित सम्यक दृष्टि वाला व बारह व्रतों का पालन करने वाला हो। मुनि ने सांसारिक जीवन और असांसारिक जीवन जीने में बहुत बड़ा अंतर बताया है। उन्होंने कहा कि एक बार जीवन सांसारिक बन जाए तो जीवन सफल हो जाएगा। धर्म दो प्रकार के होते हैं, श्रावक धर्म व श्रमण धर्म। उन्होंने कहा कि शुभ कर्म करने में देर नहीं लगनी चाहिए। इंसानों के अंदर घटिया व उच्च विचारों की तेजी मंदी आती रहती है। गृहस्थ धर्म का पालन करने से मनुष्य जन्म सार्थक हो जाता है। उन्होंने कहा कि मां अपने बच्चों को गर्भ में ही सुसांसारिक बना देती है। जिससे बच्चे में दूध, खून व वातावरण का संस्कार मिल जाने से उसे नई दिशा मिलती है। मधुर मुनि ने दुख की व्याख्या करते हुए बताया कि बुढ़ापा और जन्म मरण ये महादुख के कारण हैं। संसार में रहेंगे तो यह सब मिलता रहेगा। शरीर जड़ है तो आत्मा चेतन है। संघ सदस्य नोरतमल बाबेल ने बताया कि मंच संचालन विजय ओस्तवाल ने किया। वीर माता प्रेमबाई शांतिलाल ललवाणी ने 13 प्रत्याखान लिए और एकता पुत्री निर्मल खीवंसरा ने 9 तपस्या का पारणा किया।
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