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July 17, 2022
सावन का महीना और बारिश का दौर सभी लोगों के लिए आकर्षक मौसम होता है। ऐसे में सावन में आने वाले त्योहारों को लेकर लोगों में विशेष उत्साह का माहौल होता है। सावन मास में हरियाली तीज और सिंजारे पर राजस्थानी परंपरा के अनुसार युवतियों और महिलाओं में खासतौर से लहरिया पहनने का प्रचलन चला आ रहा है। लहरिया रंगने की एक अनूठी कला है। लहरिया लोक कला से प्रेरित माना गया है इसकी शुरुआत को लेकर कहा जाता है कि यह 19वीं शताब्दी से शुरू हुआ। राजस्थान में खासकर मेवाड़ से जुड़े स्थानों की संस्कृति में यह सबसे ज्यादा प्रचलित है। मेवाड़ में इसके पहनने की परंपरा काफी पुरानी रही है। पुराने दौर में नीले रंग का लहरिया राजपरिवार की निशानी माना जाता था। लहरिया राजस्थान की पहचान है और यह प्रिंट मारवाड़ी और राजपूत महिलाओं में हमेशा से प्रचलित रहा है। पारंपरिक लहरिया हमेशा कच्चे रंग में रंगा जाता है कहते हैं सावन में जब महिला कच्चे रंग का लहरिया ओढ़ कर जाती है और पानी बरसता है तो उस लहरिये का रंग सुहागन की मांग में उतरता है जो बेहद शुभ माना जाता है। राजस्थान की संस्कृति में यह रिवाज़ है कि बहू बेटियों की मनुहार के लिए उन्हें लहरिया लाकर दिया जाता है। लहरिया सौभाग्य व सुकून का प्रतीक भी माना जाता है। सावन में पहने जाने वाले लहरिये में हरा रंग शुभ माना जाता है। वहीं राजस्थान में पंचरंगी लहरिया प्रसिद्ध है। इन दिनों महिलाओं ओर युवतियों द्वारा लहरिये की खरीदारी जोरों पर है। वही दुकानदारों द्वारा भी आधुनिक दौर के रंग-बिरंगे लहरिये उपलब्ध कराए गए हैं। जिनकी खरीदारी जोर शोर से की जा रही है। कस्तूरी साड़ी के विक्रेता गौरव गुप्ता ने बताया कि 2 साल से कोरोना संक्रमण की वजह से त्यौहार नहीं मनाये जा सके लेकिन इस साल लोगों में उत्साह है। महिलाओं और युवतियों द्वारा जमकर खरीदारी की जा रही है। उनके द्वारा भी दुकान में नई डिजाइन के लहरिये मंगवाए गए हैं, इस बार लहरियों में साड़ियों के साथ-साथ सूट, ओढ़नी और लहंगे भी उपलब्ध हैं।
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