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क़लमकार: वेद प्रकाश दाधीच को चुनाव हरवाने वाले नेताओं को क्या सबक नहीं सिखाया जा सकेगा

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February 27, 2021

क्या इज़्ज़त लूटने वालों को पार्टी प्राश्रय देती रहेगी

वेद प्रकाश दाधीच को चुनाव हरवाने वाले नेताओं को क्या सबक नहीं सिखाया जा सकेगा



क्या इज़्ज़त लूटने वालों को पार्टी प्राश्रय देती रहेगी




प्रो सारस्वत और वेद प्रकाश से सवाल पूछता मेरा बेबाक़ ब्लॉग




सुरेन्द्र चतुर्वेदी




किशनगढ़ के दिग्गज नेता और भाजपा के महामंत्री वेद प्रकाश दाधीच को,भाजपा के ही महामंत्री संपत साँखला और सुरेश दगड़ा ने मिलकर चुनाव हरवा दिया। चुनाव प्रभारी प्रो सारस्वत को हँसी का पात्र बनाया गया।फ़ोन पर साँखला और सुरेश ने जम कर ठहाके लगाए।दाधीच की हार को अपने खाते में लिखा और चाल , चेहरा और चरित्र का नारा लगाने वाली पार्टी अनुशासन का गला घोंट का ख़ामोश बैठ गई।





सारस्वत और वेद प्रकाश का कहना है कि उन्होंने प्रदेश नेतृत्व को फ़ोन पर साँखला और सुरेश दगड़ा के बीच हुई बात सुना दी थी।बात सुनाने के बावज़ूद कोई कार्यवाही न होना दर्शाता है कि दाधीच और सारस्वत जी की शिक़ायत को या तो आला कमान ने गंभीरता से नहीं लिया है या साँखला के विरुद्ध कार्यवाही करवाना उनके वश की बात नहीं।





वेद प्रकाश दाधीच किशनगढ़ की शान माने जाते हैं।भाजपा के महामंत्री पद पर होना यह बताता है कि पार्टी में भी उनकी ख़ासी इज़्ज़त है। औद्योगिक नगरी किशनगढ़ में वेदप्रकाश एक सम्मानित नाम है।सांसद भागीरथ चौधरी उनके पार्टनर हैं। मंझे हुए पूर्व देहात अध्यक्ष बी पी सारस्वत उनके साथ साए की तरह मौज़ूद रहते हैं,ऐसे में इतना आसान नहीं हो सकता कि वेद प्रकाश को अभिमन्यु की तरह घेर कर पार्टी के रिश्तेदार हरवा के हँसी उड़ाएं और पार्टी कोई कार्यवाही न करे।





पार्टी में शायद कुछ शक्तिशाली नेता षड्यंत्री नेताओं के पीछे खड़े भी हो जाएं...... तब भी यदि इतने भीषण आरोपों को (जो स्वयं सिद्ध हों ) ,पर पार्टी कार्यवाही न करे ये हो ही नहीं सकता।




इस संबंध में मेरी राष्ट्रीय स्तर के एक नेता ,जो अजमेर मूल से जुड़े हुए हैं बात हुई।उन्होंने भी मामले को बेहद संवेदनशील बताया और कहा कि मामले की शिक़ायत राष्ट्रीय अनुशासन समिति को की जानी चाहिए थी।




मज़ेदार और हास्यास्पद बात ये रही की जब मैंने ब्लॉग लिखने से पूर्व प्रोफेसर सारस्वत से बात की तो वे ये कह कर बात टाल गए कि मामला क्यों कि वेद प्रकाश जी का है अतः उनको ही सीधी कार्यवाही करनी चाहिए।अब उनसे ये कौन पूछे कि मामला सिर्फ़ वेद प्रकाश जी का ही नहीं उनका भी है। वे किशनगढ़ चुनाव में प्रभारी थे।भाजपा का बोर्ड बनाए जाने वाले जश्न का सेहरा उन्होंने भी अपने सिर पर धारण किया था ।दूसरी महत्वपूर्ण बात ये कि फ़ोन की जो वार्ता वायरल हुई उसमें संपत साँखला ने उन पर जो फब्तियां कसीं और ठहाके लगाए उस पर उनका आवाज़ उठाना भी बनता है।उनकी ख़ामोशी किसी भी तरह पार्टी निष्ठ नहीं कही जा सकती।





जहाँ तक वेद प्रकाश जी का सवाल है ,उनसे भी मेरी बात हुई।उनकी बात सुनकर लगा कि वे इस निंदनीय घटना से शायद दुःखी ही नहीं हुए हैं।क़रारी शिकस्त के बाद भी वे अब तक दूसरी प्राथमिकताओं में उलझे हुए हैं।सफ़ाई दे रहे हैं कि वे हाई कमान को लिखित में शिक़ायत नहीं दे पाए।एक दो रोज़ में देकर आएंगे।





उनका जवाब सुनकर ताज़्ज़ुब हुआ।इतनी मोटी खाल के वे नज़र तो नहीं आते।इतने डरपोक भी वे नहीं कि इज़्ज़त मिट्टी में मिलाने वालों को माफ़ कर दें।इतने कमज़र्फ़ भी नहीं कि शहर में शक़्ल न दिखा पाने वाली हार को ज़हर का घूँट मान कर पी जाएं।





_मान सहित विष खाय के शंभु भए जगदीश,_



_बिना मान अमृत पियो ,राहु कटायो शीश_




बिना मान के वेद प्रकाश जी अमृत पीने वालों में से नहीं।ये बात अलग है कि वे अभी अपनी हार के कारणों और कारकों को जान कर भी चुप बैठे हुए हैं।




उनका चुप बैठना उस औरत की तरह है जिसकी कुछ मित्र गुंडों ने इज़्ज़त लूट ली हो और वह लिखित में शिक़ायत ये कह कर नहीं कर रही हो कि अभी उसे और ज़रूरी काम निबटाने हैं।




यदि उनकी मौखिक शिक़ायत पर कोई कार्यवाही नहीं हुई तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।प्रो सारस्वत भी ये कह कर पीछा नहीं छुड़ा सकते कि उन्होंने फोन की रिकॉर्डिंग हाई कमान को सुनवा दी है। वे रिकॉर्डिंग सुनवा दें और फिर भी कार्यवाही न हो इसके लिए उनका सम्मान भी तो ख़तरे में पड़ जाता है।





कार्यवाही न होने से पता चलता है कि हेडमास्टर जी का संगठन पर कितना प्रभाव है।अपने चेले को इतने सारे आरोपों से घिरे होने के बावजूद , संगठन पदाधिकारियों की शिकायतों के बाद भी किसी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं होना ऐसे संगठन के लिए बहुत बड़ी बात है। जो पार्टी प्रशिक्षण शिविर लगाकर अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासित रहने का पाठ पढ़ाती है वह अनुशासनहीनता पर हाथ पर हाथ कैसे रख सकती है।इतनी नक़ली वह कैसे हो सकती है।





ये विचित्र संयोग है कि प्रशिक्षण शिविर के मुखिया प्रो सारस्वत और अनुशासन समिति के मुखिया लखावत हैं।





सारस्वत की शिकायत पर कार्यवाही लखावत को करनी है परंतु वरिष्ठ पदाधिकारी सारस्वत से ज्यादा महत्वपूर्ण हेडमास्टर साहब का शिष्य संपत साँखला है जो दावा करता है कि उसने पंगा लेने वाले कई धुरंधरों को राजनीति से चम्पत कर दिया है।




संपत जी को ये नही मालूम कि इस बार वे चक्रव्यूह में फंस चुके हैं। इस बार लोग उन्हें ही राजनीति से चम्पत करने के मूड में हैं।




इसके लिए मुख्य रूप से किसी जमाने में संपत के लिए किसी से भी पंगा ले लेने वाली बहन अनिता भदेल अब उनके विपरीत खड़ी हैं। इसके लिए वे अकेली भी नहीं ।उनके साथ भाऊ बलि देवनानी जी, कद्दावर नेता प्रो सारस्वत, लाला बना, धर्मेंद्र गहलोत सब स्वतः ही निबटाने की क़वायद में जुटे हुए हैं।




बस अगर थोड़ा बहुत आशीर्वाद उन्हें जिला स्तर पर मिल रहा है तो वो शहर अध्यक्ष डॉ प्रियशील हाड़ा का है।




जहां तक मैं हाड़ा को जानता हूँ, डॉ हाड़ा एक समझदार और सुलझे हुए व्यक्ति हैं और वो किसी झमेले में पड़ते भी नही है परंतु संपत भाई के प्रभाव में क्यों है ये समझ से परे है। जबकि शहर अध्यक्ष के नाते इस प्रकरण में पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्तता उजागर होने पर संबंधित के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करवाना उनका भी प्राथमिक दायित्व बनता है।


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