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February 21, 2021
पूरे घर मे सन्नाटा था,
जो जी आए बोल रहा था।
पेड़ की हरक़त पागल जैसी,
पत्ता पत्ता ख़ौफ़ज़दा था।
उसने तो मेरी ज़ुबान से,
पूरे जिस्म को बांध दिया था।
कड़ी धूप,पतझर का मौसम,
पूरा जंगल ही नँगा था।
मुझमें घोड़े दौड़ रहे थे,
हर घोड़े पर मैं बैठा था।
दूर से बस लाशें दिखती थीं,
शायद मुर्दों का टीला था।
हाथ-पैर सब अलग पड़े थे,
सबको ख़ुद से जोड़ रहा था।
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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