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क़लमकार: क्या मैं झूँठ बोल रहा हूँ...

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February 11, 2021

अजमेर शहर के डॉ प्रियशील हाडा इन दिनों चर्चाओं में हैं

क्या मैं झूँठ बोल रहा हूँ...




सुरेन्द्र चतुर्वेदी





अजमेर शहर के डॉ प्रियशील हाडा इन दिनों चर्चाओं में हैं। एक तो इसलिए कि उनकी पत्नी यानी हमारी भाभी जी ब्रज लता हाडा चुनाव जीतकर नगर निगम की मेयर बनी हैं। दूसरा इसलिए कि बहन अनीता जी एक परिवार एक पोस्ट का तर्क देकर, भाभी के मेयर होने पर, भैया को अध्यक्ष पद से हटाने की मांग उठा चुकी हैं ।





सुना है पार्टी के एक बाहुबली नेता ने प्रियशील भैया को आश्वस्त कर दिया है कि उन्हें अध्यक्ष पद से कोई नहीं हटा सकता और ना उनको त्यागपत्र देना चाहिए।यद्यपि ये भाई हाड़ा की महानता है कि उन्होंने अपना पद मोह त्याग कर आलाकमान के कहने पर तत्काल इस्तीफ़ा देना स्वीकार लिया है।





चर्चित हुए प्रियशील हाडा एक चरित्रवान नेता हैं। वैसे मैं उन्हें आज भी नेता से ज्यादा डॉक्टर ही मानता हूं।वे शहर के एक नामचीन और लोकप्रिय डॉक्टर हैं।





यूँ ज़िले में एम बी बी एस करके राजनीति में आने वाले शहर में कई डॉक्टर रहे और हैं ।डॉक्टर राजकुमार जयपाल, डॉक्टर श्रीगोपाल बाहेती, डॉ कस्तूर चंद चौधरी आदि। और भी कई हो सकते हैं, मगर डॉक्टर प्रियशील इनमें सबसे असली डॉक्टर हैं । उनकी आजीविका ही डॉक्टरी से चलती है। उनका बाकायदा क्लीनिक है और धौला भाटा क्षेत्र में उनका अच्छा ख़ासा मरीज वर्ग है। अपने सटीक इलाज़ के कारण वे समाज की जरूरत बन चुके हैं।





राजनीति में आने की खुजली कब , कैसे और किसे लग जाए कहा नहीं जा सकता। यह खुजली ऐसी होती है जो एक बार लग जाए तो आदमी को कहीं का नहीं छोड़ती।





ज़रा देखिए डॉ कस्तूर चंद चौधरी को।सरकारी सर्विस छोड़ कर राजनीति में आ गए ।बाद में न राजनीती के लायक रहे न डॉक्टरी के। देखिए ज़रा कांग्रेसी नेता डॉ श्री गोपाल बाहेती को। शहर के बीचों बीच, शानदार मौके पर उनकी क्लीनिक है ।वे मरीजों से कितना पैसा रोज़ कमा पाते हैं यह पूरा शहर जानता है ।वह तो ग़नीमत है कि गोपाल जी का उनको साथ मिल गया जो क्लिनिक समय पर तो खुल जाता है । कुछ मरीजों का उद्धार भी हो जाता है, वरना डॉक्टर श्रीगोपाल बाहेती तो सिर्फ़ राजनेता ही बनकर रह गए हैं। डॉक्टरी में उनका दीदा तो लगता ही नहीं।





एक और राजनेता हैं डॉ राज कुमार जयपाल । वे भी चाहते तो चिकित्सा क्षेत्र में धूम मचा सकते थे।कई लोगों का रोज़ इलाज़ कर सकते थे ।मगर ऐसा हो न सका। आदरणीय जसराज जयपाल और श्रीमती स्वर्गीय भगवती जयपाल ने शायद सपना देखा होगा कि उनका पुत्र डॉक्टर बन कर खूब नाम और पैसा कमाएगा मगर उनके भी राजनीति की खुजली ऐसी चली कि उन्होंने डॉक्टरी छोड़कर मुर्गी पालन शुरू कर दिया। सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को छोड़ कर ,वे सादा मुर्गियों के अंडे से धनार्जन कर रहे हैं।उन्होंने भी राजनीति में अपने माता-पिता की तर्ज पर काफी नाम कमाया है।





अब डॉ प्रियशील हाड़ा की बारी है । उन्हें तय करना है कि वे राजनीति में रहेंगे या डॉ बन कर रसोई चलाएंगे। बहन अनीता भदेल की मांग पर वे पद पर न रहें या भाऊ के कहने पर शहर अध्यक्ष बने रहें... मगर अपनी आत्मा की आवाज़ या मरीज़ों की कराहों से प्रभावित होकर वे चाहें तो इस्तीफा भी दे सकते हैं।






डॉ हाड़ा एक ईमानदार व्यक्ति हैं, जो मेरी नज़र में ,किसी भी रूप में राजनीति के लायक नहीं कहे जा सकते। उनको देखकर साफ़ तौर पर लगता है कि वे ज्यादा दिनों तक सक्रिय राजनीति में नहीं रह पाएंगे। यदि वे राजनीति में रहे तो उनको एक साथ चार जिम्मेदारियां निभानी होंगी।





पहली ज़िम्मेदारी ,उनकी अपने डॉक्टरी की प्रैक्टिस करनी होगी ताकि परिवार का ख़र्च चलें! दूसरी ज़िम्मेदारी क्यों कि भाभी जी को नगर निगम के काम करने होंगे इसलिए घर की जिम्मेदारियों से जुड़े काम भी उनको ही करने होंगे! तीसरी ज़िम्मेदारी अपनी अनुभवहीन पत्नी को राजनीति में कामयाब करने के लिए निगम के कामों पर भी निगरानी रखनी होगी! चौथी ओढ़ी हुई ज़िम्मेदारी होगी भाजपा अध्यक्ष होने की!!






यहाँ याद आ रहे हैं मुझे अपने प्रिय मित्र और हाड़ा जी के भाई स्वर्गीय राजेंद्र हाडा जी।वे यदि जीवित होते और उनकी जगह होते ,तो आराम से ये सारे काम कर सकते थे।





जहां तक मुझे मालूम है कि भाभी ब्रज लता भी अपने पति की ही तरह ईमानदार हैं ,मगर उनकी ईमानदारी लोकप्रियता के सर्वोच्च नेता ज्ञान सारस्वत जैसी है या डॉ बाहेती जैसी मैँ नहीं जानता।





राजस्थान में एक बहुत गंदी कहावत है, जो सुनने में भयंकर अश्लील लगती है उसके मायने बड़े गहरे हैं।न चाहते हुए भी बता देता हूँ। रांड तो रंडापा काट भी ले पर रंडवे काटने दें तो..।एक इसी आशय का फ़िल्मी गाना भी आया था।  मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए । डॉ बाहेती का ही उदाहरण लीजिए।वे जब तक विधायक रहे या नगर सुधार न्यास के चेयरमेन ,तब उन्होंने भी अपनी ईमानदार छवि को बनाए रखने के लिए क्या नहीं किया ,पर उनके आसपास के चमचों ने उन पर भ्रष्टाचार के आरोप तक लगवा दिए। उनकी ईमानदारी ख़ाली पीली में बदनाम हो गई।






क्या हाड़ा भाभी सांप की भाँभी में अपनी ईमानदारी को ज़िन्दा रख पाएंगी भ्रष्टाचार से संचालित होने वाले नगर निगम में उनका दामन बेदाग़ रह पाएगा




ज़रा जीतने वाले पार्षदों के नाम तो एक बार देखिए । पूर्व मेयर धर्मेंद्र गहलोत के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के कई रिकॉर्ड तोड़ने वाले महारथी अभी भी उनकी ही टीम में हैं। हां ,उनकी ही पार्टी में । वे उनको अपने इशारे पर ईमानदारी से पार्षदी करने को मजबूर कर कर दें यह नहीं हो सकता।




संभावना तो यह व्यक्त की जा रही है कि वे नाम मात्र की मेयर बनकर रह जाएँ और निम्नतम श्रेणी के उच्चतम लोग उनको अपनी शर्तों पर सत्ता चलवाएँ।




बताएं चंपत भाई क्या मैंने कुछ गलत कहा


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