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January 22, 2021
पंछी वो अम्बर का है,
खाते पीते घर का हैं।
पहली बार इधर का था,
अबकी बार उधर का है।
तलवारों के दाम कहाँ,
ऊँचा दाम तो सर का है।
मोम सा दिखने वाला वो,
जाने किस पत्थर का है।
वो है गुम्बद का पंछी,
ये पंछी खंडहर का है।
मिले थे हम तब बारिश थी,
ये मौसम पतझर का है ।
ठहरे जल में लहर उठे,
काम तो ये कंकर का है।
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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