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क़लमकार: असली कोरोना योद्धा अपमानित हुए और नक़ली सम्मानित

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September 7, 2020

निकम्मे जिला शिक्षा अधिकारी कछावा ने कर दिखाया काला कारनामा

असली कोरोना योद्धा अपमानित हुए और नक़ली सम्मानित

निकम्मे जिला शिक्षा अधिकारी कछावा ने कर दिखाया काला कारनामा

असली महिला कोरोना योद्धाओं ने पिया अपमान का ज़हर

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

शहर में कांग्रेसियों ने अगस्त माह में क्रांति सप्ताह मनाया। मुझे बहुत खुशी हुई ।अगस्त क्रांति सप्ताह मनाने का मक़सद बेहद वंदनीय था। इस सप्ताह में शहर कांग्रेस की तरफ से कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। यदि इन कार्यक्रमों को पार्टी की मंशा के अनुरूप आयोजित किया जाता तो चारों तरफ प्रशंसा होती मगर पार्टी की सारी नेक नीयत धरी रह गई और बिल्ली ने बंदर की रोटियों का बंटवारा अपने हिसाब से कर दिया।
कांग्रेसी नेता डॉ श्रीगोपाल बाहेती वह शक्ति सिंह राठौड़ पवित्र भावनाओं से ऐसे शिक्षकों का सम्मान करवाना चाहते थे जिन्होंने कोरोना काल में अपने पारिवारिक सुखों को त्यागकर निष्ठा के साथ युद्ध लड़ा, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना जनता के बीच रहकर कोरोना को रोकने में मदद की , लोगों को जागरूक किया , उन्हें बचाया। पार्टी का उद्देश्य इतना नेक था कि मैं उनकी नीयत को नमन करता हूँ लेकिन भ्रष्ट तंत्र और बिल्ली की बंदरबांट ने इस पवित्र कार्यक्रम को बदनाम कर के रख दिया ।
जिला शिक्षा अधिकारी देवी सिंह कच्छावा ने अपनी घिनौनी कारिस्तानी इस बार भी दिखा दी। उन्होंने सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया। अपने चहेतों की लिस्ट बनाकर उन्हें सम्मानित करवा दिया। कोरोना योद्धाओं के नाम पर जो लोग सम्मानित किए गए उनमें अधिकांश ऐसे अधिकारी व कर्मचारी थे जिन्होंने कोरोना काल में अपनी सेवाएं युद्ध के मैदान में दीं ही नहीं।
योद्धा तो वे होते हैं जो युद्ध काल में मैदान पर डटे रहकर दुश्मन का मुकाबला करते हैं। यहां तो ऐसे लोगों को योद्धा घोषित कर दिया गया जिनका मैदान छोड़, घर से भी कोरोना से लोहा लेने का अनुभव नहीं था।
जो लोग वास्तविक योद्धा थे उन्हें नज़रअंदाज़ कर नक़ली योद्धाओं का सम्मान करवा दिया गया ।हमेशा से तानाशाही व लालफीताशाही के आरोपों से घिरे रहे जिला शिक्षा अधिकारी देवी सिंह कच्छावा ने सही पूछो तो नक़ली योद्धाओं को सम्मानित करवा कर ,असली योद्धाओं को अपमानित कर दिया ।
जिन शिक्षक शिक्षिकाओं ने रात दिन एक करके, घर-घर जाकर सर्वे किया , आइसोलेशन में रहने वालों पर नज़र रखी, उनको तो योद्धा के रूप में सम्मानित नहीं किया गया बल्कि उन अधिकारियों को सम्मान दे दिया गया जो एक दिन भी शहर की गलियों और घरों में नहीं घूमें ।
जब लॉक डाउन चल रहा था तब जिला शिक्षा अधिकारी अपने घरों में सुरक्षित बैठकर आदेश प्रसारित कर रहे थे। ज़रा देखिए इन 3 योद्धाओं की औक़ात । तीन अतिरिक्त जिला शिक्षा अधिकारी कमलेश यादव, मुन्नी शर्मा, और दर्शना शर्मा ये तीनों एक दिन भी किसी अस्पताल नहीं गए। संक्रमित इलाकों में जाकर इन्होंने एक दिन एक कदम नहीं रखा। घर में पंखा चला कर आराम से बैठे रहे और निकम्मे देवी सिंह ने इनको भी योद्धा बता कर सम्मानित करवा दिया।
*महात्मा गांधी स्कूल की प्राचार्य विजय लक्ष्मी यादव की ड्यूटी योद्धाओं की मॉनिटरिंग करने के लिए लगाई गई, किंतु 10 दिनों में ही इनके पति देव बीमार हो गए और उन्होंने ड्यूटी देने से छूट हासिल कर ली। मैदान से बहाना बनाकर खिसकी हुई इस महिला को भी योद्धा बता कर सम्मानित करवा दिया गया ।पुलिस लाइन स्कूल की अध्यापिका मधु गर्ग को सम्मानित किया गया मगर उनके स्कूल के प्राचार्य ने खुद लिख कर दिया है कि कोरोना काल में उनको कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी। देखिए देवी सिंह की निम्न स्तरीय मानसिकता(नीचता नहीं कह रहा) का निकम्मापन कि उन्हें भी सम्मानित करवा दिया गया।
इसी तरह सावित्री स्कूल की व्याख्याता नीलम सोनी को सम्मानित होने वालों की लिस्ट में जोड़ दिया गया। स्कूल की प्राचार्य का कहना है कि इन्होंने 1 दिन भी युद्ध के मैदान में सेवाएं प्रदान नहीं की। यहां एक बात मजेदार यह है कि नीलम सोनी लिस्ट में होने के बावजूद सम्मान लेने नहीं गईं। उनकी अंतरात्मा ने नक़ली सम्मान लेने से मना कर दिया ।
लोहा खान स्कूल की प्राचार्य रश्मि शर्मा ने बिना कोरोना से युद्ध लड़ने का कोई अनुभव लिए सम्मान ले लिया। इसी तरह से लिस्ट में और भी कई फर्जी नाम हैं।इसी प्रकार सैंट्रल गर्ल्स स्कूल के स्टाफ ने बताया कि सविता सोगानी ने भी कोई कोरोना ड्यूटी नहीं दी। खानपुरा से बबिता सिंह भी सूची में सन्दिग्ध है। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के चार कर्मचारियों को भी सम्मानित करवाया गया है वह भी संदेह के घेरे में है। जबकि मेरी सोच से तो जिला शिक्षा अधिकारी महोदय को सभी ब्लॉक से 2-2 वास्तविक कोरोना वारियर्स के नाम लेकर उन्हें सम्मानित करवाना चाहिए था
सवाल यह उठता है कि ऐसी महिलाएं जो तृतीय श्रेणी अध्यापिकाएं थीं ,जिन्होंने लगातार कई महीनों तक गांव -गांव ,ढाणी -ढाणी जाकर अपनी सेवाएं प्रदान की, कई कोरोना की शिकार भी हो गईं। कई जो अजमेर में रहती थी लेकिन युद्ध लड़ने के लिए, बन्द आवागमन के बावजूद निरंतर गांव में जाती थीं उन्हें भी सम्मानित नहीं किया गया ऐसी अपमानजनक स्थिति में वे अब क्या सोच रही होंगी सोचा जा सकता है।
डॉक्टर श्रीगोपाल बाहेती, उनके सहयोगी शक्ति सिंह या अन्य महत्वपूर्ण पदों पर आसीन कांग्रेसी स्वयं भी इस बात से खुश नहीं। उनकी नेक नियत पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता मगर देवी सिंह कच्छावा की निम्न स्तरीय मानसिकता ने जिनको करोना वारियर्स बना कर सम्मानित करवाया उनकी अंतरात्मा भी जानती होगी कि वे सम्मान के असली हक़दार नहीं थे ।
अब कुछ कांग्रेसी नेताओं ने शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर शिकायत की है। पर शिकायत से कुछ होने वाला नहीं। पहले भी देवी सिंह कच्छावा के विरुद्ध स्थानीय कांग्रेसी ताल ठोक चुके हैं।जूते मारने की धमकी दे चुके हैं। लेकिन उनके शरीर का कोई भी बाल बांका नहीं हुआ ।इस शिकायत से भी कुछ होने वाला नहीं। सच्चाई तो ये है कि जिन लोगों का सम्मान हुआ वह भी अपमानित है जिनका नहीं हुआ वे भी।


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