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अंदाजे बयां: लेडी सिंघम चिन्मयी ख़ौफ़ के घेरे में   - सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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August 12, 2019

लेडी सिंघम चिन्मयी ख़ौफ़ के घेरे में   - सुरेन्द्र चतुर्वेदी


             


कहा था ना मैंने कि जितना मैं ईमानदार हूँ उतना ही निर्भीक भी। अजमेर के लिए मेरी भावनाएं समर्पित हैं। मैं किसी राजनेता ,पार्टी ,अधिकारी, या विचारधारा से राखी नहीं बंधवाता। और यही वजह है कि मुझे अजमेर के शुद्ध व प्रबुद्ध नागरिकों का समर्थन बराबर मिल पा रहा है। मैं सुधी पाठकों का अपने प्रति दिए जा रहे  समर्थन के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ।


      अजमेर की दो लेडी सिंघम का में प्रारंभ से ही कायल रहा हूँ। उनकी प्रशासनिक सूझबूझ, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति मेरी आस्था.... मेरे अजमेर प्रेम जैसी ही है। नगर निगम की  आयुक्त चिन्मई गोपाल और ट्रैफिक पुलिस की सुनीता गुर्जर। इन दोनों से मैं कभी आज तक नहीं मिला ।उनसे क्या मैं किसी भी अधिकारी से आज तक नहीं मिला।ये मेरे स्वभाव में ही नहीं। लेकिन इन दोनों की कार्यशैली को मैं अद्भुत मानता रहा हूँ।नगर निगम में व्याप्त भाई भतीजावाद ,भ्रष्टाचार और प्रसाद वितरण की जो परंपरा वर्षो से चली आ रही थी उसे रोकने के लिए चिन्मयी गोपाल ने निश्चित रूप से नकेल कसने का काम किया है।मेयर धर्मेंद्र गहलोत से उनकी तनातनी इस तरह रही  जैसे चील के घौंसले से मांस  छीना  जा रहा हो ।उन्होंने तू डाल -डाल मैं पात -पात की तर्ज पर अजमेर के हितों को जीवित रखते हुए अपनी निर्भीकता और ईमानदारी का परिचय दिया।ख़ास तौर से आना सागर में नावों के ठेके को लेकर लिए गए उनके फैसले ऐतिहासिक माने गए। 


मगर........चांदी के सिक्कों की चमक से प्रभावित न होने वाली लेडी सिंघम आज-कल इतनी लाचार और ख़ामोश  क्यों नजर आ रही हैं  उनके  फ़ैसले इतने थके -हारे ,बेचैन और थके हुए  क्यों नज़र आ रहे हैं इतने कमज़ोर और निरीह  कि ताक़तवर चिकित्सा मंत्री डॉ रघुशर्मा ,प्रशासनिक अधिकारी भवानी सिंह  देथा और जिला कलेक्टर  का दवाब उनके फ़ैसलों को शर्मिंदगी तक पहुंचाने वाला है।वो  चाहती हैं  कि उनके फ़ैसले दवाब से दूर रहें लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप से वो अपने ही फ़ैसलों  पर कायम नहीं रह पा रही। शहर पूछ रहा है और मैं भी पूछ रहा हूँ कि नावों के  ठेके को लेकर लिए गए उनके कठोर फ़ैसले क्या  रघु शर्मा , जे.पी. दाधीच ,या देथा जी  के दवाब में आकर बदलने पर विवश किए जा रहे हैं 

           यहां मैं आपको फिर बता दूं कि आना  सागर में किसी की भी नावें तैरें या डूब जाएं मुझे कोई लेना देना नहीं ।ना मैं नए  ठेकेदार का वकील हूँ ना पुराने ठेकेदार का हिमायती।चिन्मयी गोपाल ने सारे दवाबों से दूर रह कर जो ठेका 60 लाख की जगह एक करोड़ 65 लाख में दिलवा दिया था मैं उस  ईमानदारी के साथ हूँ। राजनेताओं से पंगा लेने की बहादुरी के साथ हूँ। 

    मगर पिछले दिनों चिन्मयी जी की ख़ामोशी गहरी होती जा रही है। शहरवासियों को बता दूँ कि उदयपुर के जिस ठेकेदार ने एक करोड़ 65 लाख का सालाना ठेका लिया था उसकी नावें सुभाष उद्यान में औंधी पड़ी हुई हैं।नए व पुराने ठेकेदारो  के बीच चल रहा शनि की साढ़ेसाती का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। ठेकेदार दाधीच इतनी आसानी से आना सागर छोड़ने वाले पूत नहीं ।वो  ठेका निरस्त करवाने की दिशा में जा रहे हैं।अपने आकाओं के दम पर  वो नावों की उम्र पर किसी से सवाल उठवा कर अपनी  उंगली नियमों की गुफा में घुमा रहे हैं।  फाइलों पर सवाल दर सवाल उठवाकर  ठेका निरस्त करवाए जाने की दिशा में चौतरफा दबाव डाला जा रहा है। शहर के हितों की 12 बजा कर चिन्मयी जी के फ़ैसलों को चिन्मयी नृत्य कराया जा रहा है। मुझे अफ़सोस  है कि लेडी सिंघम राजनीतिक और प्रशासनिक चक्रव्यूह में घिर चुकी हैं।पुराने नावों के ठेकेदार जे.पी .दाधीच की  नावें आज भी आना सागर में मूछें तान कर  तैर रही हैं। जबकि आना सागर का नया  ठेकेदार अपनी विवशता का रोना लेकर इधर-उधर मारा मारा फिर रहा है ।

     आयुक्त श्री गोपाल भली -भांति जानती हैं कि फाइलों पर जो सच्चाई उनके सामने लाई गई है वह बहुत मजबूत है ।वो चाहें तो आना सागर से जे.पी दाधीच के दख़ल को ख़ारिज़  कर सकती हैं मगर वे चाहकर भी ऐसा नहीं कर पा रहीं।उन पर पड़ रहा दवाब उनकी ईमानदारी पर भारी पड़ रहा है ।ऐसा ही होता है जब जंगल में शेरनी गीदड़ों के चंगुल में फंस जाती है।भेड़िए  संगठित होकर हमलावर हो जाते हैं ।लेडी सिंघम इन राजनेताओं के दबाव को झेल नहीं पा रहीं। शायद उनको डर है कि उनका ट्रांसफर हो जाएगा

चिन्मयी जी क्या आप पूरी सर्विस  नगर निगम अजमेर में ही रहना चाहती हैं क्या आप सोचती हैं  कि आपका ट्रांसफर यहां से कभी नहीं होगा कभी क्या आप कभी भी जा सकती हैं।  कहीं भी  जा सकती हैं। मगर कोई राजनेता या अधिकारी आपको भारतीय प्रशासनिक सेवाओं से हटा या गिरा नहीं सकता। सरकारी अधकारियों का सेवा काल तो वैसे भी ख़ाकी लिफाफों  में  बंद होता  है। घर का सामान हमेशा पैक रहता है फिर किस बात का इतना डर किससे डर क्या सोचना करो जो विचार रखा है ...करो जो सच है ....करो जो न्याय संगत है ...करो जो अजमेर के हित में है... भूल जाओ ट्रांसफर का डर...राजनेताओं या अफ़सरों का ख़ौफ़...आपकी फितरत में डरना कब लिखा था आप के संस्कारों में झूँठ  के आगे घुटने टेकना है ही नहीं.... जाना तय है फिर डरना क्या लिख जाओ फाइलों पर अपना ज़मीर... अपनी अना ....अपना फ़ैसला...ईश्वर आपके साथ है ...आमीन...इलाही आमीन....

मेरे इस ब्लॉग से किसी को कष्ट पहुंचा हो तो फिर वही बात उखाड़ लेना।कटवा ली है।


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