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October 10, 2026
शनि सर्वपितृ अमावस्या पर पुष्कर में उमड़े श्रद्धालु, किया तर्पण, पुष्कर में हजारों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी
शनि सर्वपितृ अमावस्या पर 52 घाटों पर पिंडदान और तर्पण, पूर्वजों की आत्मशांति के लिए प्रार्थना, परिवार की खुशहाली की कामना
पितृ पक्ष के समापन पर शनि सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर शनिवार को धार्मिक नगरी पुष्कर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। दूरदराज से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र सरोवर में स्नान कर अपने पूर्वजों को याद किया। सरोवर के 52 घाटों पर तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए गए। अलसुबह से घाटों और बाजारों में मेले जैसा माहौल नजर आया।
सरोवर के मुख्य गऊ घाट, ब्रह्म घाट, राम घाट और वराह घाट पर श्रद्धालुओं ने तीर्थ पुरोहितों के सान्निध्य में धार्मिक अनुष्ठान किए। लोगों ने पितरों की आत्मशांति और परिवार की खुशहाली की कामना की। अनुष्ठान के बाद श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों के निमित्त ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान दिया। तर्पण और पिंडदान के लिए विभिन्न वर्गों के लोगों में उत्साह दिखाई दिया। आम श्रद्धालुओं के साथ ख्याति प्राप्त हस्तियों ने भी पुष्कर सरोवर के घाटों पर अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म कर श्रद्धांजलि दी।इस अवसर पर ऐसे श्रद्धालु भी पहुंचे, जिन्हें अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं थी। पितृ पक्ष के दौरान किसी कारण से श्राद्ध नहीं कर पाए लोगों ने भी सर्वपितृ अमावस्या पर अपने पितरों के निमित्त अनुष्ठान किए।
पंडित रविकांत शर्मा ने बताया कि सर्वपितृ अमावस्या पर सभी पितरों का एक साथ श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। जिन लोगों को पितरों की तिथि ज्ञात नहीं हो या जो पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से चूक गए हों, उनके लिए धार्मिक परंपरा में इस दिन का विशेष महत्व माना जाता है।उन्होंने बताया कि पुष्कर सरोवर पर श्रद्धालु तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध सहित विभिन्न धार्मिक कर्म करने आते हैं। उनके अनुसार, धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीराम भी अत्रि मुनि के निर्देश पर अपने पिता राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान और श्राद्ध करने पुष्कर आए थे।पुष्कर में प्रचलित लोकमान्यता के अनुसार, पांडवों ने भी यहां रहकर शनि सर्वपितृ अमावस्या के संयोग की कई वर्षों तक प्रतीक्षा की थी। लोककथा में कहा जाता है कि संयोग नहीं आने पर उन्होंने इसके कलियुग में बार-बार आने का शाप दिया था। यह प्रसंग स्थानीय धार्मिक मान्यता के रूप में सुनाया जाता है। इसी आस्था के साथ श्रद्धालु इस अवसर पर पुष्कर पहुंचते हैं।
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