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September 19, 2026
12 प्रतिशत ST आरक्षण में से 9 प्रतिशत भील समुदाय के लिए निर्धारित करने की मांग, मुख्य सचिव, कार्मिक विभाग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस, याचिकाकर्ताओं ने ST नियुक्तियां रोकने की भी मांगी अंतरिम राहत
जयपुर। राजस्थान में अनुसूचित जनजाति आरक्षण के भीतर अलग-अलग समुदायों के लिए उप-वर्गीकरण की मांग अब हाईकोर्ट पहुंच गई है। राजस्थान हाईकोर्ट ने उस याचिका पर राज्य और केंद्र सरकार सहित संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है, जिसमें प्रदेश में अनुसूचित जनजाति को मिल रहे 12 प्रतिशत आरक्षण में से 9 प्रतिशत आरक्षण भील समुदाय के लिए निर्धारित करने की मांग की गई है। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने शंकर लाल दहिया एवं अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किए हैं। अदालत ने मुख्य सचिव, प्रमुख शासन सचिव कार्मिक, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। हालांकि इस स्तर पर हाईकोर्ट ने भील समुदाय को 9 प्रतिशत उप-कोटा देने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। अदालत ने फिलहाल याचिका में उठाए गए मुद्दों पर संबंधित पक्षों का जवाब मांगा है, जिसके बाद मामले की आगे सुनवाई होगी।
क्या है 9% भील आरक्षण की मांग?
याचिकाकर्ता आदिवासी भील आरक्षण संघर्ष समिति से जुड़े बताए गए हैं। उनकी मांग है कि राजस्थान में ST वर्ग को दिए जा रहे कुल 12 प्रतिशत आरक्षण का उप-वर्गीकरण किया जाए और इसमें से 9 प्रतिशत हिस्सा भील समुदाय के लिए निर्धारित किया जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल विभिन्न समुदायों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति तथा सरकारी सेवाओं में उनके वास्तविक प्रतिनिधित्व का पर्याप्त आकलन किए बिना आरक्षण का लाभ समान रूप से उपलब्ध मान लिया गया है। याचिका में दावा किया गया है कि भील समुदाय को सरकारी सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में उनकी आबादी तथा पिछड़ेपन की तुलना में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसके विपरीत याचिकाकर्ताओं ने मीणा समुदाय को ST आरक्षण के लाभ का बड़ा हिस्सा मिलने का दावा किया है। ये बातें फिलहाल याचिकाकर्ताओं के दावे हैं और राज्य सरकार का विस्तृत जवाब अदालत के सामने आना बाकी है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का आधार
मामले में याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संविधान पीठ के ऐतिहासिक State of Punjab v. Davinder Singh फैसले का सहारा लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त 2024 को 6:1 के बहुमत से आरक्षित वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण को संवैधानिक रूप से स्वीकार किया था और पूर्व के E.V. Chinnaiah फैसले को पलट दिया था। केंद्र सरकार ने बाद में संसद में दिए जवाब में भी इस फैसले को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उप-वर्गीकरण को अनुमेय मानने वाले फैसले के रूप में दर्ज किया। इस निर्णय का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोई राज्य केवल राजनीतिक या सामान्य धारणा के आधार पर आरक्षित वर्ग के भीतर एक समुदाय को अलग लाभ नहीं दे सकता। इस तरह के उप-वर्गीकरण के पीछे सामाजिक पिछड़ेपन और सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसे कारकों से संबंधित ठोस और अनुभवजन्य आंकड़ों का आधार होना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी उप-वर्गीकरण की कार्रवाई को डेटा से समर्थित किए जाने पर जोर दिया गया था।
भील समुदाय के डेटा का मुद्दा भी उठाया
राजस्थान हाईकोर्ट में दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि भील समुदाय की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति तथा सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व को लेकर पर्याप्त और अद्यतन सरकारी डेटा उपलब्ध नहीं है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि समुदाय की स्थिति जानने के लिए लंबे समय से व्यापक सर्वे नहीं किया गया है। यही मुद्दा इस मामले में आगे महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के उप-वर्गीकरण संबंधी फैसले में राज्य द्वारा किसी विशेष उप-समूह को अतिरिक्त प्राथमिकता देने के लिए वस्तुनिष्ठ सामग्री और अनुभवजन्य आंकड़ों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
राष्ट्रीय ST आयोग के पत्र का भी जिक्र
याचिका में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के एक पत्र का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार आयोग ने 25 फरवरी को राजस्थान के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत ST वर्ग में उप-वर्गीकरण और सुप्रीम कोर्ट के Davinder Singh फैसले के संदर्भ में कार्रवाई की बात कही थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसके बावजूद राजस्थान में अब तक ST आरक्षण का उप-वर्गीकरण नहीं किया गया। हालांकि आयोग के उस पत्र की व्याख्या और उस पर राज्य सरकार की ओर से क्या कार्रवाई की गई, यह भी अब अदालत में जवाब आने के बाद अधिक स्पष्ट होगा।
ST की नियुक्तियों पर रोक लगाने की भी मांग
याचिका केवल 9 प्रतिशत उप-कोटा की मांग तक सीमित नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से यह अंतरिम राहत भी मांगी है कि जब तक इस मामले का फैसला नहीं हो जाता, तब तक ST श्रेणी के तहत होने वाली नियुक्तियों को रोक दिया जाए।फिलहाल उपलब्ध आदेश और रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने ऐसी नियुक्तियों पर कोई रोक नहीं लगाई है। इस मांग पर भी संबंधित सरकारों और प्राधिकरणों का पक्ष सुनने के बाद ही आगे का फैसला हो सकता है।
मीणा समुदाय को लेकर याचिका में क्या दावा?
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में दावा किया है कि राजस्थान में मीणा समुदाय ने सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर अपेक्षाकृत प्रगति की है और ST आरक्षण से मिलने वाली सरकारी नौकरियों तथा अन्य अवसरों में उसे बड़ा हिस्सा प्राप्त हो रहा है। दूसरी तरफ भील समुदाय पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल नहीं कर पाया है। यह अदालत द्वारा तय तथ्य नहीं है, बल्कि याचिका में रखा गया पक्ष है। आगे सरकार और अन्य प्रतिवादी इन दावों, आंकड़ों और आरक्षण के वर्तमान वितरण को लेकर अपना जवाब देंगे। इस कारण अभी किसी समुदाय के वास्तविक प्रतिनिधित्व को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या बदला?
Davinder Singh फैसला आरक्षण कानून की दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले E.V. Chinnaiah निर्णय को आरक्षित सूची के भीतर राज्य द्वारा उप-वर्गीकरण पर बड़ी बाधा माना जाता था। सात जजों की पीठ ने उस दृष्टिकोण को पलटते हुए माना कि आरक्षित वर्ग कोई ऐसी पूरी तरह एकसमान इकाई नहीं है जिसमें सभी समूह समान स्तर पर लाभ प्राप्त कर रहे हों। उचित परिस्थितियों में उन समूहों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण किया जा सकता है जो अपेक्षाकृत अधिक वंचित या कम प्रतिनिधित्व वाले हैं। साथ ही यह अधिकार असीमित नहीं है। राज्य को यह दिखाना होगा कि जिस समुदाय को विशेष लाभ दिया जा रहा है उसके पक्ष में ऐसा वर्गीकरण करने का तथ्यात्मक और संवैधानिक आधार मौजूद है।
क्या हाईकोर्ट सीधे 9% आरक्षण दे सकता है?
मौजूदा स्थिति में यह कहना जल्दबाजी होगी कि राजस्थान में अब 9 प्रतिशत भील उप-कोटा लागू होने वाला है। हाईकोर्ट ने अभी केवल नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। आगे अदालत यह जांच सकती है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले, उपलब्ध आंकड़ों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप इस मुद्दे पर उचित विचार किया है या नहीं।
अंतिम सुनवाई के दौरान अदालत परिस्थितियों और कानून के अनुसार सरकार को किसी मुद्दे पर निर्णय लेने, डेटा एकत्र करने या अन्य उचित प्रक्रिया अपनाने के लिए निर्देश दे सकती है। लेकिन वास्तविक उप-वर्गीकरण किस अनुपात में होना चाहिए—और याचिका में मांगा गया 9 प्रतिशत आंकड़ा कानूनी व तथ्यात्मक कसौटी पर टिकता है या नहीं—यह अभी न्यायिक परीक्षण और सरकारी जवाब का विषय है।
राजस्थान की आरक्षण व्यवस्था पर पड़ सकता है बड़ा असर
यदि भविष्य में राज्य सरकार ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाती है तो इसका प्रभाव सरकारी भर्तियों और अन्य आरक्षण लाभों के वितरण पर पड़ सकता है। लेकिन इसके लिए केवल किसी समुदाय की मांग पर्याप्त नहीं होगी। Davinder Singh फैसले की कसौटी के अनुसार उप-वर्गीकरण का आधार संबंधित समूहों के पिछड़ेपन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व से जुड़े विश्वसनीय आंकड़े होने चाहिए।
फिलहाल राजस्थान हाईकोर्ट में मामला शुरुआती चरण में है। राज्य सरकार, केंद्र सरकार और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के जवाब आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 12 प्रतिशत ST आरक्षण के भीतर भील समुदाय के लिए अलग उप-कोटा बनाने की मांग पर आगे न्यायिक प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।
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