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September 19, 2026
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष बोले—जहां पार्टी या निर्दलीय मजबूत, वहां पार्षदों पर दबाव बनाने की कोशिश, भाजपा सरकार ने आरोप खारिज कर कहा—शिकायत मिलेगी तो पुलिस जांच करेगी
जयपुर। राजस्थान में नगर निकायों के अध्यक्ष, सभापति और अन्य प्रमुख पदों के चुनाव से ठीक पहले सियासी तनाव चरम पर पहुंच गया है। प्रदेश के कई नगर निकायों में पार्षदों की बाड़ेबंदी, पुलिस की आवाजाही, गुमशुदगी और अपहरण की शिकायतों तथा निर्दलीय पार्षदों के समर्थन को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। इसी बीच कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, मुख्यमंत्री कार्यालय और भाजपा नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए हैं। डोटासरा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए कांग्रेस द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे राजनीतिक विशेषण “पर्ची मुख्यमंत्री” का प्रयोग किया और आरोप लगाया कि निकाय चुनाव में भाजपा की पूरी रणनीति केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े नेताओं और मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों के माध्यम से संचालित की जा रही है। यह कांग्रेस नेता का राजनीतिक आरोप है; ऐसा कोई स्वतंत्र रूप से सत्यापित प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है जिससे यह स्थापित हो कि केंद्रीय नेता CMO के जरिए स्थानीय बोर्ड गठन की कार्रवाई संचालित कर रहे हैं।
डोटासरा का आरोप—पार्षदों पर दबाव बनाने के लिए प्रशासन का इस्तेमाल
डोटासरा ने आरोप लगाया कि अधिकारियों को कांग्रेस और निर्दलीय पार्षदों पर दबाव बनाने, उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज करने और उन्हें भाजपा के पक्ष में लाने के लिए कहा जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिन निकायों में कांग्रेस या निर्दलीय मजबूत स्थिति में हैं, वहां भाजपा जनादेश स्वीकार करने के बजाय प्रशासन और पुलिस के जरिए राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष इससे पहले भी कई मौकों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने मंडावा, बीकानेर, बानसूर, फतहनगर, कुचेरा और देवली-उनियारा जैसे स्थानों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि पार्षदों के ठहरने वाले होटलों और रिसॉर्ट्स तक पुलिस पहुंच रही है और उनके बारे में पूछताछ कर रही है।
डोटासरा ने गिनाए कई निकाय
डोटासरा ने अपने आरोपों में भरतपुर, बीकानेर, जोधपुर, उदयपुर, श्रीगंगानगर, संगरिया, कुचेरा, बहरोड़, बानसूर, दूनी, देवली-उनियारा, मंडावा, मांढण, नीमराना, सीकर, लोसल, धोद, कानोड़ और भींडर समेत कई निकायों का जिक्र किया। उनका आरोप है कि अलग-अलग स्थानों पर एक जैसी रणनीति अपनाई जा रही है—पहले पार्षदों पर दबाव, उसके बाद पुलिस या प्रशासनिक कार्रवाई और फिर बोर्ड गठन का प्रयास। इन दावों की हर निकाय में स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और कई मामलों में पुलिस ने कार्रवाई के पीछे शिकायत, गुमशुदगी रिपोर्ट या कानूनी प्रक्रिया को वजह बताया है।
संगरिया का मामला बना बड़ा उदाहरण
हनुमानगढ़ जिले की संगरिया नगरपालिका का मामला भी इस राजनीतिक विवाद के केंद्र में आया है। वहां एक पार्षद और उनके पिता के कथित अपहरण की शिकायत दर्ज होने के बाद संगरिया पुलिस पंजाब पहुंची थी। मौके पर कांग्रेस विधायक अभिमन्यु पूनिया और पुलिस अधिकारियों के बीच तीखी बहस हुई। बाद में संबंधित लोगों ने पुलिस के सामने अपहरण से इनकार करते हुए अपनी इच्छा से वहां रहने की बात कही।
कांग्रेस ने इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव बताया, जबकि पुलिस की कार्रवाई दर्ज शिकायत की जांच के सिलसिले में हुई थी। यह घटनाक्रम दोनों पक्षों के दावों के बीच चल रही खींचतान का उदाहरण बन गया है।
मंडावा में पुलिस ने होटल की तलाशी ली
झुंझुनूं जिले के मंडावा में भी कांग्रेस पार्षदों के ठहरने वाले होटल पर पुलिस पहुंची थी। यहां पुलिस का कहना था कि एक पार्षद को कथित तौर पर बंधक बनाए जाने की शिकायत मिली थी और सर्च वारंट के आधार पर कार्रवाई की गई। जिस पार्षद की तलाश की जा रही थी, वह मौके पर नहीं मिला। दूसरी ओर कांग्रेस ने कार्रवाई को भाजपा के दबाव से जोड़ते हुए इसका विरोध किया। ऐसे मामलों के कारण प्रदेश में पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक बाड़ेबंदी के बीच की सीमा को लेकर बहस तेज हो गई है।
भरतपुर के घटनाक्रम पर भी कांग्रेस हमलावर
भरतपुर नगर निगम में निर्दलीय उम्मीदवार विचित्रा सिंह के नामांकन वापस लेने के बाद भाजपा प्रत्याशी अनुराधा सिंह के निर्विरोध महापौर बनने का रास्ता साफ हुआ था। कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को दबाव की राजनीति से जोड़ा और दावा किया कि नामांकन वापसी से पहले संबंधित पक्ष पर प्रशासनिक दबाव बनाया गया था। भाजपा और सरकार ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। भरतपुर का उदाहरण देते हुए डोटासरा ने कहा कि जिन निकायों में भाजपा संख्या के स्तर पर पीछे है, वहां दूसरे रास्तों से बोर्ड बनाने की कोशिश की जा रही है।
21 सितंबर क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
राजस्थान में अनेक नगर परिषद और नगर पालिकाओं के अध्यक्ष व सभापति पद के लिए 21 सितंबर को मतदान होना है। कई निकायों में भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक दल के पास पूर्ण बहुमत नहीं है और निर्दलीय पार्षद निर्णायक भूमिका में हैं।
राज्य के स्थानीय निकाय परिणामों में बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशी जीतकर आए हैं। कई नगर परिषद और नगर पालिकाओं में बोर्ड गठन का गणित इन्हीं पार्षदों के समर्थन पर टिका है। इसी कारण चुनाव परिणाम आने के बाद भी दोनों प्रमुख दलों ने पार्षदों को होटल और रिसॉर्ट में एक साथ रखने की रणनीति अपनाई है।
कांग्रेस का दावा—‘जनादेश बदलने की कोशिश’
डोटासरा का आरोप है कि भाजपा उन स्थानों पर भी बोर्ड बनाने की कोशिश कर रही है जहां उसे मतदाताओं से स्पष्ट जनादेश नहीं मिला। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताया और प्रशासन को निष्पक्ष रहने की चेतावनी दी।
इससे पहले भी डोटासरा ने कहा था कि यदि पार्षदों को लेकर जारी तनाव के बीच कोई गंभीर हिंसा या अप्रिय घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार और पुलिस की होगी।
सरकार का जवाब—कांग्रेस के आरोप निराधार
कांग्रेस के आरोपों पर राजस्थान सरकार ने अलग पक्ष रखा है। गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम ने कहा कि कांग्रेस हताशा में पुलिस पर आरोप लगा रही है। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के परिवार की ओर से गुमशुदगी, अपहरण या इच्छा के विरुद्ध रोककर रखने की शिकायत दी जाती है तो पुलिस का कानूनी दायित्व है कि वह संबंधित व्यक्ति को खोजे और उसका बयान ले।
बेढम ने कांग्रेस नेताओं की ओर से लगाए जा रहे खरीद-फरोख्त के आरोपों को भी गलत और बेबुनियाद बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस अपनी ही बाड़ेबंदी और राजनीतिक रणनीति को भाजपा पर आरोप के रूप में पेश कर रही है।
निकाय चुनाव से आगे बढ़ी लड़ाई, अब बोर्ड गठन पर नजर
नगर निकायों के वार्ड चुनाव खत्म हो चुके हैं, लेकिन वास्तविक राजनीतिक मुकाबला अब महापौर, सभापति और अध्यक्ष पदों को लेकर दिखाई दे रहा है। जहां स्पष्ट बहुमत है, वहां भी पार्टियां अपने पार्षदों को एकजुट रख रही हैं; जबकि त्रिशंकु निकायों में निर्दलीय पार्षदों का समर्थन निर्णायक बन गया है। इस माहौल में कांग्रेस सरकार पर पुलिस और प्रशासन के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगा रही है, जबकि भाजपा और सरकार इन आरोपों को खारिज कर पुलिस कार्रवाई को कानूनसम्मत बता रहे हैं। अब 21 सितंबर के मतदान के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रदेश के अलग-अलग नगर निकायों में संख्या का मौजूदा गणित किस रूप में बोर्ड में बदलता है।
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