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July 1, 2026
आना सागर व वरुण सागर के डी-सिल्टिंग महाघोटाले और वेटलैंड भूमि सीमा निर्धारण की मांग पर कोर्ट सख्त! राजस्थान सरकार के मुख्य शासन सचिव सहित 12 को नोटिस!
अजमेर। अजमेर की ऐतिहासिक धरोहर आना सागर और वरुण सागर झील के अस्तित्व के साथ खिलवाड़ और डी-सिल्टिंग के नाम पर जनता के पैसों की बंदरबांट के खिलाफ कांग्रेस ने बड़ा मोर्चा खोल दिया है। पूर्व विधायक व अध्यक्ष अजमेर शहर जिला कांग्रेस कमेटी डॉ. राजकुमार जयपाल और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सैयद फखरे मोइन जो इस प्रकरण में मुख्य पक्षकार हैं की ओर से पूर्व लोक अभियोजक विवेक पाराशर एडवोकेट द्वारा सिविल न्यायाधीश नगर उत्तर अजमेर की न्यायाधीश आशिका जैन के न्यायालय में पेश किए गए इस महत्वपूर्ण जन प्रतिनिधित्व प्रकरण पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायाधीश आशिका जैन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जिन 12 उत्तरदायी पक्षकारों को कारण बताओ नोटिस जारी करने के कड़े आदेश दिए हैं, उनमें राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव, शासन सचिव स्वायत्त शासन विभाग, शासन सचिव पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, सचिव जल संसाधन विभाग, अजमेर जिला कलेक्टर, आयुक्त अजमेर विकास प्राधिकरण, आयुक्त नगर निगम अजमेर, सचिव अजमेर विकास प्राधिकरण, क्षेत्रीय अधिकारी राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल, अधिशाषी अभियंता जल संसाधन विभाग, अधिशाषी अभियंता नगर निगम अजमेर तथा संबंधित निर्माण कंपनी ठेकेदार शामिल हैं। अदालत द्वारा इन सभी को नोटिस जारी कर इस प्रकरण की आगामी सुनवाई 16 जुलाई 2026 को नियत की गई है। इस जन प्रतिनिधित्व प्रकरण में आना सागर और वरुण सागर झील के डी-सिल्टिंग कार्य की आड़ में हो रही धांधली को रोकने के साथ-साथ इन झीलों की वेटलैंड भूमि का पूर्ण रूप से सीमा निर्धारण करने की भी बड़ी मांग की गई है, ताकि झीलों के पारिस्थितिकी तंत्र को भू-माफियाओं और अवैध कब्जों से हमेशा के लिए सुरक्षित किया जा सके। आना सागर और वरुण सागर झील के डी-सिल्टिंग प्रोजेक्ट में महाघोटाले का आरोप लगाते हुए जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी रोकने के लिए कांग्रेस कानूनी मैदान में उतरी है।
आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व विधायक डॉ. राजकुमार जयपाल, पूर्व लोक अभियोजक विवेक पाराशर और वरिष्ठ नेता सैयद फखरे मोइन ने संयुक्त रूप से सरकार और प्रशासन की नीयत पर तीखे सवाल खड़े किए। प्रेस वार्ता के दौरान पूर्व लोक अभियोजक विवेक पाराशर ने प्रशासनिक हठधर्मिता पर कड़ा प्रहार करते हुए विशेष रूप से स्पष्ट किया कि मामला चूंकि अब माननीय अदालत में चला गया है और राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव सहित सभी 12 जिम्मेदार पक्षकारों को कारण बताओ नोटिस जारी हो चुके हैं, ऐसे में न्यायालय की गरिमा का सम्मान करते हुए इस पूरे मामले की सुनवाई व अंतिम निर्णय आने तक प्रशासन को तत्काल प्रभाव से उक्त डी-सिल्टिंग का कार्य रोक देना चाहिए। विवेक पाराशर ने जोर देकर कहा कि लोकतांत्रिक और विधिक व्यवस्था में यही नैतिकता है और यही न्याय है। उन्होंने चेतावनी दी कि मामला अदालत में जाने के बाद भी काम जारी रखना सीधे तौर पर न्यायप्रणाली को चुनौती देने जैसा होगा।
नेताओं ने कहा कि अजमेर की जनता के खून-पसीने की कमाई के 78.80 करोड़ रुपये को इस तथाकथित डी-सिल्टिंग प्रोजेक्ट के नाम पर बर्बाद करने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। बिना किसी वैज्ञानिक आधार और तकनीकी अध्ययन के करोड़ों रुपये का यह प्रोजेक्ट सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। उन्होंने साफ कहा कि हम अजमेर की लाइफलाइन कही जाने वाली झीलों की आड़ में इस तरह की खुली लूट कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। सरकार द्वारा बर्बाद किए जा रहे इस 78.80 करोड़ रुपये के बजट को रोकने और आना सागर व वरुण सागर की वेटलैंड भूमि की सीमाओं को कानूनी रूप से तय करवाकर सुरक्षित करने के लिए ही यह जन प्रतिनिधित्व प्रकरण दायर किया गया है।
इस महाघोटाले को रोकने और पर्यावरण संरक्षण की इस लड़ाई के लिए अदालत में पक्षकारों की ओर से वकीलों की फौज ने पुरजोर और आक्रामक पैरवी की। पूर्व लोक अभियोजक विवेक पाराशर, एडवोकेट जितेश धनवानी और तेजस्विनी पाराशर ने न्यायाधीश आशिका जैन के समक्ष इस पूरे प्रोजेक्ट की तकनीकी कमियों, वित्तीय विसंगतियों, वेटलैंड भूमि के संरक्षण की अनदेखी और नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे खेल को उजागर किया। लीगल टीम के अकाट्य तर्कों से सहमत होते हुए न्यायालय ने तुरंत प्रभाव से मुख्य सचिव समेत सभी 12 प्रतिवादियों को नोटिस थमाकर जवाब तलब किया है और अगली सुनवाई के लिए 16 जुलाई 2026 की तारीख मुकर्रर की है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेताओं ने इस पूरे मामले की कड़वी सच्चाई को विस्तार से उजागर करते हुए बताया कि झीलों में आ रहे गंदे पानी के स्रोतों को रोके बिना, केवल ऊपरी तौर पर मिट्टी हटाने के नाम पर 78.80 करोड़ रुपये का बजट ठिकाने लगाने का खेल खेला जा रहा है। इसके साथ ही वेटलैंड भूमि का सीमा निर्धारण न होना इस बात का सबूत है कि प्रशासन जानबूझकर भू-माफियाओं को फायदा पहुंचाना चाहता है। यह पूरा प्रोजेक्ट अजमेर की जनता या पर्यावरण के फायदे के लिए नहीं, बल्कि चुनिंदा ठेकेदारों और रसूखदार अधिकारियों की जेबें भरने के लिए आनन-फानन में तैयार किया गया है। जब तक झीलों के ट्रीटमेंट और वेटलैंड सीमांकन का कोई स्थाई समाधान नहीं होता, तब तक इस तरह का काम केवल कागजी खानापूर्ति और सरकारी खजाने को चूना लगाना है। बिना किसी मास्टर充लान के अधिकारियों और ठेकेदारों की जुगलबंदी से जनता के पैसे का यह भारी नुकसान किया जा रहा है।
धरोहर संरक्षण की इस लड़ाई में डॉ. राजकुमार जयपाल, विवेक पाराशर और सैयद फखरे मोइन ने साफ शब्दों में ऐलान किया है कि यह सिर्फ कानूनी लड़ाई की शुरुआत है और प्रशासन को तुरंत इस कार्य को रोकना होगा। अदालत का यह नोटिस भ्रष्ट तंत्र के मुंह पर पहला तमाचा है, और जब तक इस 78.80 करोड़ रुपये की बर्बादी पूरी तरह नहीं रुक जाती और झीलों की जमीन का पूर्ण सीमांकन नहीं हो जाता, तब तक हमारी यह आर-पार की जंग जारी रहेगी।
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