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अजमेर न्यूज़: चैत्र मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को माता शीतला का होता है पूजन, अजमेर के दौलत बाग के सामने स्थित प्राचीन शीतला माता मंदिर पर रात्रि 12:00 बजे प्रथम भोग लोढ़ा परिवार ने लगाया

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March 11, 2026

शीतला माता आरोग्य स्वच्छता और रोगों से बचाव की देवी है। उनकी सवारी गधा धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक है। और वह ज्वारासुर नामक राक्षस का संघार करती है।

चैत्र मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी को माता शीतला का होता है पूजन, अजमेर के दौलत बाग के सामने स्थित प्राचीन शीतला माता मंदिर पर रात्रि 12:00 बजे प्रथम भोग लोढ़ा परिवार ने लगाया


शीतला सप्तमी और अष्टमी का पर्व मनाया गया धूमधाम से, दौलत बाग के सामने प्राचीन शीतला माता मंदिर पर रात 12:00 बजे लोढ़ा परिवार ने की पहली पूजा, चरी में ठंडे जल से माता रानी को कराया स्नान इसके बाद अन्य भक्तों ने शुरू की पूजा अर्चना, ठंडे पकवानों का लगाया भोग परिवार में सुख समृद्धि और निरोगी होने की की कामना 

शीतला सप्तमी और अष्टमी का पर्व अजमेर में भी बड़े ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। शीतला सप्तमी का पर्व होली के 7 दिन बाद मनाया जाता है और इसे बांसोड़ा भी कहते हैं। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है जो ठंडक और स्वास्थ्य की देवी मानी जाती है। यह पूजा विशेष रूप से ग्रीष्म ऋतु के आगमन से पहले की जाती है ताकि शरीर में ठंडक बनी रहे और त्वचा संबंधी बीमारियों से बचाव हो सके। अजमेर में दौलत बाग के सामने स्थित प्राचीन शीतला माता मंदिर पर रात 12:00 बजे लोढ़ा परिवार द्वारा माता रानी की पहली पूजा कर उन्हें भोग लगाया गया और ठंडा शीतल जल की चरी से माता रानी को ठंडक प्रदान की गई। मान्यता के मुताबिक माता शीतला को ठंडा व्यंजनों का भोग लगाया जाता है ताकि परिवार में सभी स्वस्थ रहें निरोगी रहे किसी को भी कोई त्वचा संबंधी बीमारी ना हो और ठंडक बनी रहे। इस दिन घरों में एक दिन पूर्व बनाए गए ठंडा व्यंजन  छाछ राबड़ी पॉल-पुरा पुरी आदि अनेकों व्यंजन बनाए जाते हैं और दूसरे दिन उन्हें ठंडा करके माता रानी को भोग लगाने के बाद ग्रहण किया जाता है। अजमेर के शीतला माता मंदिर पर प्राचीन काल से दो दिन का शीतला सप्तमी ओर अष्टमी का मेला भी लगता है। मेले में अनेक तरह की व्यंजन खेल खिलौने आदि की बिक्री होती है तो वहीं बड़ी संख्या में भक्त मेले में पहुंचकर माता रानी का दर्शन कर मनोकामनाएं मांगते हैं। शीतला सप्तमी के दिन भोजन तैयार किया जाता है और शीतला अष्टमी के दिन ठंडा भोजन किया जाता है। पूजन करने वाली महिलाओं ने बताया कि शीतला अष्टमी के दिन गर्म भोजन का सेवन वर्जित होता है इसके अलावा इस दिन महिलाओं को सिलाई कढ़ाई और बुनाई जैसे कार्य भी नहीं करने होते हैं ।मान्यता है कि इन कार्यों को करने से माता शीतला अप्रसन्न हो सकती है। साथ ही इस दिन घर में अगरबत्ती या दीपक जलाने से भी बचना चाहिए।

शीतला माता आरोग्य स्वच्छता और रोगों से बचाव की देवी है। उनकी सवारी गधा धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक है। और वह ज्वारासुर नामक राक्षस का संघार करती है।


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