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August 21, 2026
अमूल भगाओ-सरस बचाओ के नारे के साथ होगा सरस सहकार महाकुंभ, 23 अगस्त को कच्छावा गार्डन में जुटेंगे 25 हजार लोग
अजमेर। प्रदेश में अमूल के विस्तार के विरोध और सरस डेयरी एवं सहकारी व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने की मांग को लेकर रविवार, 23 अगस्त को सुबह 11 बजे कच्छावा गार्डन, तबीजी फार्म के पास ‘सरस सहकार महाकुंभ’ का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम की मुख्य थीम ‘अमूल भगाओ-सaras बचाओ’ रखी गई है। इसमें प्रदेश के 15 जिला दुग्ध संघों के सरस डेयरी अध्यक्षों के साथ राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा सहित वरिष्ठ नेता और सहकारिता क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधि शामिल होंगे। आयोजकों के अनुसार महाकुंभ में प्रदेशभर से करीब 25 हजार महिला-पुरुष शामिल होंगे।
अजमेर सरस डेयरी के उपाध्यक्ष रामचंद्र चौधरी ने बताया कि महाकुंभ में अमूल के राजस्थान में विस्तार से सरस डेयरी और लाखों पशुपालकों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर रणनीति तैयार की जाएगी। उन्होंने अमूल के विस्तार से जुड़े कई मुद्दे उठाते हुए सरकार से निर्णय पर पुनर्विचार की मांग की है।
महाकुंभ में उठाए जाएंगे ये प्रमुख मुद्दे
1.अमूल के उत्पादों में प्रिजर्वेटिव का आरोप:
चौधरी ने आरोप लगाया कि अमूल अपने कुछ उत्पादों में प्रिजर्वेटिव यानी संरक्षक का इस्तेमाल करता है, जिसे स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि इस मुद्दे को लेकर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को उठाया जाएगा।
2.थोक बिक्री से एक्सपायरी उत्पादों की आशंका:
रामचंद्र चौधरी का कहना है कि अमूल के उत्पाद बड़ी मात्रा में थोक बाजार में पहुंचते हैं। ऐसे में एक्सपायरी के नजदीक पहुंच चुके उत्पादों के बाजार में आने की आशंका बनी रहती है। महाकुंभ में इस मुद्दे पर भी चर्चा होगी।
3.कीमतों में दोहरी नीति का आरोप:
आयोजकों का आरोप है कि अमूल गुजरात में अपने उत्पाद अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराता है, जबकि अन्य राज्यों में उनकी कीमत अधिक रहती है। उनका कहना है कि ऐसी नीति से स्थानीय उपभोक्ताओं और दुग्ध उत्पादकों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
4.सरस की त्रिस्तरीय सहकारी व्यवस्था:
चौधरी ने डॉ. कुरियन की सोच का हवाला देते हुए कहा कि सरस में ग्राम स्तर की दुग्ध समितियों, जिला दुग्ध संघों और प्रदेश स्तर की व्यवस्था के माध्यम से त्रिस्तरीय सहकारी ढांचा विकसित किया गया है। उनका सवाल है कि अमूल की कार्यप्रणाली में ऐसी व्यवस्था नहीं होने पर वास्तविक लाभ किसे मिलेगा।
5.सहकारिता के उपनियम बनाम कानून:
चौधरी का आरोप है कि सरस की सहकारी संस्थाएं निर्धारित उपनियमों के तहत संचालित होती हैं, जबकि अमूल की अलग तरह की नीतियां लागू होती हैं। महाकुंभ में इस अंतर को भी प्रमुखता से उठाया जाएगा।
6.हजारों करोड़ के सरस ढांचे को बचाने की अपील:
चौधरी ने कहा कि राजस्थान में सरस के लिए वर्षों में हजारों करोड़ रुपये का बुनियादी ढांचा तैयार हुआ है। यदि अमूल को बिना उचित नीति के प्रदेश में विस्तार का अवसर दिया गया तो सरस का यह ढांचा प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने सरकार से सरस के मौजूदा ढांचे को बचाने की मांग की।
7.छोटे पशुपालकों की आजीविका पर असर की आशंका:
आयोजकों का कहना है कि अमूल के प्रदेश में आने से छोटे किसानों और पशुपालकों की आजीविका पर सीधा असर पड़ सकता है। दूध खरीद की व्यवस्था और कीमतों को लेकर स्पष्ट नीति नहीं होने से स्थानीय दुग्ध उत्पादकों के सामने प्रतिस्पर्धा की चुनौती बढ़ने की आशंका जताई गई है।
8.मुख्यमंत्री से अमूल को अनुमति नहीं देने की मांग:
रामचंद्र चौधरी ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि अमूल को राजस्थान में विस्तार की अनुमति नहीं दी जाए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने इस दिशा में निर्णय लिया तो आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा और जरूरत पड़ने पर उच्चतम न्यायालय की शरण भी ली जाएगी।
9.13 हजार दुग्ध समितियों पर संकट का दावा:
चौधरी ने दावा किया कि अमूल के प्रदेश में आने से राजस्थान की करीब 13 हजार दुग्ध समितियां प्रभावित होकर समाप्त होने की स्थिति में आ सकती हैं। इससे लाखों लोगों की आजीविका पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है।
10 सरस जिला संघों के बकाया भुगतान की मांग:
महाकुंभ में राज्य सरकार से सरस जिला संघों के बकाया भुगतान की भी मांग की जाएगी। आयोजकों के अनुसार मिल्क प्राइस योजना के तहत करीब डेढ़ साल से बकाया 300 से 400 करोड़ रुपये का जल्द भुगतान किया जाना चाहिए। साथ ही मुख्यमंत्री दुग्ध उत्पादक संबल योजना की करीब तीन माह से बकाया राशि का भी शीघ्र भुगतान करने की मांग रखी जाएगी।
रामचंद्र चौधरी ने कहा कि सरस केवल एक डेयरी ब्रांड नहीं, बल्कि राजस्थान के हजारों गांवों के पशुपालकों और लाखों परिवारों की आजीविका से जुड़ी सहकारी व्यवस्था है। इसलिए प्रदेश में दुग्ध क्षेत्र से जुड़े किसी भी बड़े निर्णय से पहले स्थानीय पशुपालकों, दुग्ध समितियों और सरस के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
‘सरस सहकार महाकुंभ’ के माध्यम से आयोजक प्रदेश की सहकारी दुग्ध व्यवस्था को बचाने और अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति पर चर्चा करेंगे।
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