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अजमेर न्यूज़: भारतीय ज्ञान परम्परा , अतीत, वर्तमान एवं भविष्य विषय पर त्रिदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ भव्य शुभारम्भ, वसुधैव कुटुम्बकम् भारत का वैश्विक संदेश - श्री देवनानी

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January 16, 2026

उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी विचारों के आदान-प्रदान के साथ नई दृष्टियों के निर्माण का सशक्त मंच बनेगी तथा परम्परा, विचार और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करेगी।

भारतीय ज्ञान परम्परा , अतीत, वर्तमान एवं भविष्य विषय पर त्रिदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ भव्य शुभारम्भ, वसुधैव कुटुम्बकम् भारत का वैश्विक संदेश - श्री देवनानी

अजमेर, 16 जनवरी। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ तथा भारतीय ज्ञान परम्परा केन्द्र, सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को महाविद्यालय के सभागार में भारतीय ज्ञान परम्परा, अतीत, वर्तमान एवं भविष्य विषय पर त्रिदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारम्भ किया गया। संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा की गहराई, उसकी समकालीन उपयोगिता तथा भावी पीढ़ी के निर्माण में उसकी भूमिका पर व्यापक विमर्श करना है।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा करुणा, सहिष्णुता एवं संतुलन का भाव स्थापित करती है। भारत की वास्तविक शक्ति आर्थिक अथवा भौतिक उन्नति में नहीं, बल्कि उसकी दृष्टि, सोच और जीवन पद्धति में निहित है। भारत ने वसुधैव कुटुम्बकम् का मंत्र देकर सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की भावना प्रदान की है। जो शांति, संवाद और समाधान का मार्ग प्रशस्त करती है। 

उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी विचारों के आदान-प्रदान के साथ नई दृष्टियों के निर्माण का सशक्त मंच बनेगी तथा परम्परा, विचार और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करेगी।

श्री देवनानी ने कहा कि वर्तमान युग विज्ञान एवं तकनीक का युग है। इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष विज्ञान ने मानव सभ्यता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है, परंतु तकनीकी प्रगति के साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना भी उतनी ही आवश्यक है। तकनीक जहाँ गति प्रदान करती है, वहीं संस्कृति संतुलन देती है और मूल्य जीवन को दिशा प्रदान करते हैं। भारत की परम्परा में विज्ञान एवं अध्यात्म, विकास एवं प्रकृति का संतुलित समन्वय सदैव रहा है। इसकी आज सम्पूर्ण विश्व को आवश्यकता है। अतीत की जड़ें वर्तमान की शाखाओं को सशक्त बनाकर भविष्य के फल को सुरक्षित करती हैं तथा संयम और संतोष की भावना भारतीय दर्शन का मूल तत्व रही है।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा अत्यंत गहन एवं समृद्ध है। इसमें वैदिक मंत्रों, उपनिषदों से लेकर आयुर्वेद तक ऐसा ज्ञान समाहित है, जो भविष्य को आकार देने की क्षमता रखता है। विज्ञान की नींव भारत के प्राचीन ग्रन्थों में मिलती है। आर्यभट का शून्य का सिद्धांत, भास्कराचार्य का खगोल विज्ञान और सुश्रुत की शल्य चिकित्सा ने विश्व को नई दिशा दी। तक्षशिला जैसे प्राचीन ज्ञान केन्द्रों में विश्वभर से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे। कला और साहित्य के क्षेत्र में भी भारत अग्रणी रहा है। इसका प्रमाण भरतमुनि का नाट्यशास्त्र है।

नई शिक्षा नीति के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत को पुनः शिक्षा का वैश्विक केन्द्र बनाने की दिशा में यह नीति महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। भारतीय संस्कृति और ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर पढ़ाने से एक सशक्त, संस्कारित और नवाचारी पीढ़ी का निर्माण होगा। विज्ञान, ज्योतिष, वैदिक गणित और योग की वैश्विक स्वीकृति भारतीय दर्शन की प्रासंगिकता को सिद्ध करती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के हित में शिक्षा, शिक्षा के हित में शिक्षक और शिक्षक के हित में समाज की भावना को सुदृढ़ करना आवश्यक है। इस प्रकार के कार्यक्रम भारतीयता को सशक्त बनाते हैं।

मुख्य वक्ता महात्मा गांधी शांति एवं स्थायी विकास समिति के अध्यक्ष प्रो. भगवती प्रसाद शर्मा ने कहा कि समस्त आधुनिक विषयों का ज्ञान भारतीय शास्त्रों और परम्पराओं में विद्यमान है। वर्तमान वैज्ञानिक सिद्धांतों के संदर्भ प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में उपलब्ध हैं तथा भविष्य में होने वाली अनेक खोजों के संकेत भी भारतीय शास्त्रों में मिलते हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत वाङ्मय के शब्दों की उत्पत्ति वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी उतरती है। ऋग्वेद में हृदय में विद्युत ऊर्जा के उल्लेख का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान आज उसी सिद्धांत पर पेसमेकर का उपयोग कर रहा है। प्राचीन भारत की धातु विज्ञान की उत्कृष्टता का उदाहरण जिंक के निर्यात से मिलने वाली समृद्धि है।

प्रो. शर्मा ने कहा कि भारतीय ग्रन्थों में ब्रह्माण्ड विज्ञान, पृथ्वी और सूर्य की दूरी, प्रकाश की गति, पृथ्वी की गोलाई एवं घूर्णन गति जैसे वैज्ञानिक तथ्यों का उल्लेख मिलता है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में प्राकृतिक नियमों की व्याख्या प्रतीकात्मक रूप से की गई है। उन्होंने कहा कि भारत अतीत में विश्व का सर्वाधिक समृद्ध देश रहा है और वैश्विक उत्पादन में उसकी महत्वपूर्ण भागीदारी थी। उन्होंने यह भी कहा कि 18वीं शताब्दी में भारतीय ग्रन्थों को विकृत करने के प्रयास हुए। इसके लिए आज आवश्यकता है कि शास्त्रों का संगोपांग, प्रामाणिक एवं तथ्यात्मक अध्ययन किया जाए और उन्हें किसी भी प्रकार के विकृतिकरण से सुरक्षित रखा जाए।

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के अध्यक्ष श्री लाल गुप्ता ने कहा कि परम्परा केवल अतीत की वस्तु नहीं है, बल्कि वर्तमान संकटों के समाधान का आधार बनती है और भविष्य की नींव रखती है। भारतीय ज्ञान परम्परा सदियों से पारिवारिक जीवन की दिनचर्या का हिस्सा रही है, किंतु औपचारिक शिक्षा में उसे समुचित स्थान नहीं मिल पाया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति शिक्षा के गुरुत्व केन्द्र को भारत में स्थापित करने का प्रयास कर रही है। समाज में विद्यमान ज्ञान परम्परा को शिक्षा का अंग बनाकर स्थायी विकास के ठोस समाधान प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि साहित्य और शिक्षा में भारतीयता को समुचित स्थान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता का इतिहास सांस्कृतिक स्वाधीनता का इतिहास भी है और भारत स्थायी विकास के साथ एक स्वस्थ, उद्यमी, शांत एवं सुरक्षित राष्ट्र के रूप में उभरेगा।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न शोध पुस्तिकाओं का विमोचन किया गया। इसमें शोध नवनीत शोध पत्रिका, अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी विशेषांक के पंचम शोध पत्र एवं योजना मंच 2.0 पत्रिका 2025-26 शोध मंथन का विमोचन किया गया। इनकी सॉफ्ट कॉपी भी उपलब्ध करा दी गई है।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. मनोज कुमार बहरवाल ने कहा कि वर्तमान समय संक्रमण का काल है और भारतीय राष्ट्रीय विचारों पर प्रश्न उठाने वालों को यह संगोष्ठी तथ्यात्मक एवं बौद्धिक उत्तर प्रदान करेगी। भारत की वृहद ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाने में यह संगोष्ठी उपयोगी सिद्ध होगी।

कार्यक्रम के अंत में सहायक निदेशक श्री अनिल कुमार दाधीच ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में श्री हनुमान सिंह राठौड़ सहित अनेक शिक्षाविद्, शोधार्थी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।


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