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January 13, 2026
भारत के विकास में सिंधी समुदाय के योगदान की एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
सिंधी भाषा और संस्कृति का संरक्षण ही राष्ट्र की शक्ति - श्री वासुदेव देवनानी
अजमेर, 13 जनवरी। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर के सिंधु शोध पीठ एवं राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारत के विकास में सिंधी समुदाय के योगदान विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी तथा पारितोषिक वितरण का कार्यक्रम आज महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के सभागार स्वराज सभागार में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में हरि सेवा धाम भीलवाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी महाराज के ने आशीर्वचन प्रदान किया। मुख्य अतिथि राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी रहे। तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर सुरेश कुमार अग्रवाल महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु ने की।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्री वासुदेव देवनानी ने कहा कि सिंधी समाज भारत की बहुसांस्कृतिक आत्मा का एक सशक्त और गौरवपूर्ण अंग है, जिसकी जड़ें सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता से जुड़ी हुई हैं। सिंधी भाषा, संस्कृति, पहनावे, लोकगीत, परंपरा से नव पीढ़ी को अवगत कराएं। 1947 के विभाजन में इस समाज ने भारी पीड़ा और विस्थापन सहा। अपनी भाषा, संस्कृति और आत्मसम्मान को अक्षुण्ण रखते हुए भारत में नए सिरे से जीवन आरंभ किया। विभाजन के समय अपनी मान मर्यादा अस्मिता को बचाकर आए सिंधी समुदाय के लोग अपनी मेहनत एवं लगन के साथ भारत को श्रेष्ठ बनाने में निरंतर अपना योगदान दे रहे है।
उन्होंने कहा कि परिश्रम, ईमानदारी और उद्यमशीलता के बल पर सिंधी समाज ने व्यापार, उद्योग, शिक्षा और सेवा के क्षेत्रों में देश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक सेवाओं के माध्यम से इस समाज ने राष्ट्र के मानव संसाधन को सशक्त किया। जिस प्रकार शक्कर दूध में घुल जाती है उसी प्रकार सिंधी समुदाय ने भारत की उन्नति एवं समृद्धि में अपना योगदान दिया है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम से लेकर स्वतंत्र भारत तक सिंधी समाज ने बलिदान, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति की मिसालें प्रस्तुत की हैं। सिंधी भाषा, लोक संस्कृति और सनातन मूल्य भारतीय सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करते हैं। आज भी यह समाज आर्थिक विकास के साथ सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। सिंधी समुदाय के लोग विकसित भारत, श्रेष्ठ भारत-उत्कृष्ट भारत के लक्ष्य के साथ सकंल्पित होकर देश की उन्नति में अपने पवि़त्र दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत जीवन मूल्यों का देश है। अपनी भाषा संस्कृति को साथ लेकर देश को उत्कृष्ट बनाने में सिंधी समुदाय ने अपनी भूमिका निभाकर देश का गौरव बढ़ाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका दिवस के रूप में मनाकर विभाजन के समय आए व्यक्तियों का सम्मान बढ़ाया है। उन्होंने सिंधी भाषा को 10 अप्रेल 1967 को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के योगदान को भी याद किया।
इस अवसर पर हरि सेवा धाम भीलवाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि सिंधी समाज की भाषा, संस्कृति और अस्मिता के संरक्षण का सशक्त आह्वान है। उन्होंने आह्वान किया कि सिंधु केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता का जीवंत केंद्र रहा है, पर 1947 के विभाजन के बाद सिंधी समाज राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक आधार से वंचित हो गया। उन्होंने अपने आशीर्वचनों से समाज में एकता एवं अपनी संस्कृति को बनाये रखने का संदेश दिया। अपने मूल मल्यों को साथ लेकर समाज एवं देश की प्रगति में अपनी भागीदारी निभाए।
उन्होंने कहा कि सिंधी समाज आर्थिक रूप से सशक्त होते हुए भी संगठित शैक्षिक व सांस्कृतिक ढांचे के अभाव में कमजोर पड़ रहा है। विश्वभर में फैले सिंधी समुदाय के पास संसाधन हैं, पर एकजुट होकर अपने लिए विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और सांस्कृतिक कोष बनाने की चेतना नहीं बन पाई है। स्वामी हंसराम ने चेताया कि केवल सरकार पर निर्भर रहने से कुछ नहीं होगा, समाज को स्वयं जागृत होकर प्रतिनिधित्व, अधिकार और संरक्षण के लिए आगे आना होगा।
उन्होंने कहा कि आज भाषा के लुप्त होने के साथ संस्कृति और पहचान भी संकट में है। समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति आभूषण से ही होती है। भाषा को बचाना सबसे पहला कर्तव्य है, क्योंकि घर में बोली जाने वाली भाषा ही पीढ़ियों तक संस्कृति को जीवित रखती है। उन्होंने आह्वान किया कि सिंधी समाज अपनी भाषा, वेशभूषा, परंपराएँ, गीत और संस्कारों को फिर से अपनाए। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सच्ची विरासत और अपने पुरखों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि पिछले चार महीनों में विश्वविद्यालय की सामाजिक व डिजिटल दृश्यता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे समाज की अपेक्षाएँ और प्रतिक्रियाएँ स्पष्ट रूप से सामने आई हैं। समाज चाहता है कि विश्वविद्यालय सक्रिय, शोधोन्मुख और वैदिक-सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ विश्वविख्यात संस्थान बने। उन्होंने रेखांकित किया कि सिंधु सभ्यता केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि विविधता, सहअस्तित्व और सनातन मूल्यों की महान सभ्यता है, जिसका भारत की सांस्कृतिक पहचान में अद्वितीय योगदान है। श्री वासुदेव देवनानी के प्रयासों और दूरदृष्टि से सिंधु शोध पीठ एवं सिंधी भाषा-संस्कृति के संरक्षण का कार्य नई गति से आगे बढ़ रहा है।
कुलगुरु ने इस बात पर जोर दिया कि सिंधी भाषा केवल एक समुदाय तक सीमित न रहकर राष्ट्रव्यापी पहचान बने, क्योंकि भाषा के माध्यम से ही संस्कृति और संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। भाषा के लोप से संस्कृति का भी लोप होता है, इसलिए उसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। विश्वविद्यालय में सिंधु शोध पीठ द्वारा समग्र शिक्षा एवं शोध कार्यों पर विशेष ध्यान देकर बढ़ाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति में सिंधु सभ्यता का योगदान रहा है। भाषा की विविधता विभाजन नहीं बल्कि सामाजिक संस्कृति को सौन्दर्य प्रदान करती है। सिंधी को प्रदेश एवं राष्ट्र की भाषा के रूप में ओर अधिक बढ़ाया जाना चाहिए। देश की संस्कृति को जीवित रखने के लिए भाषा का जीवित रहना आवश्यक है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में भाषा के द्वारा ही संस्कार, परंपरा, रीति रिवाज का हस्तातरण होता है। सामाजिकता को बनाये रखने के लिए भाषा का ज्ञान नव पीढ़ी के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम का सञ्चालन प्रो. हासो ददलानी ने किया और आभार ज्ञापन कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि संत्सग से विवेक एवं वैराग्य का उदय होता है। संत हरिराम के आर्शीवचनों से समुदाय के लोगों में नई चेतना जगी है।
कार्यक्रम में सिंधु शोध पीठ द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं को भी पुरस्कृत किया गया। इनमें उच्च शिक्षा वर्ग में प्रकाश तेजवानी, मोनिका चौधरी, महिमा सोनी, रिया वालेचा तथा स्कूल शिक्षा वर्ग में आरती, इशिका खटवानी, भव्य करमचंदानी शामिल है। शोध पीठ में संविदा पर नव नियुक्त उपनिदेशक डॉ. लाजवंती छतवानी की नियुक्ति पत्र भी दिया गया।
कार्यक्रम में डॉ मंजू लालवानी, डॉ. बलदेव मटलानी. डॉ. काजल रामचंदानी, डॉ. अशोक मुक्ता, डॉ वंदना रामवाणी, श्री कृष्णा रतनानी, डॉ. कमल गोखलनी, डॉ. अमित रामचंदानी, डॉ. सीपी ददलानी, श्री विजय मंगलानी डॉ. पुष्पा कोडवानी, डॉ. मीना असवानी, मनोज कुमार ने पत्र वाचन किया।
इस अवसर पर श्री सुरेश सिंधी, श्री प्रताप पिंजानी, श्री रमेश चेलानी, श्री घनश्याम भगत, प्रो. नरेश धीमान, प्रो. प्रवीण माथुर, प्रो. रितु माथुर, प्रो. अरविंद पारीक, प्रो. मोनिका भटनागर, डॉ. आशीष पारीक, डॉ. लारा शर्मा, प्रो. सुब्रत दत्ता, प्रो. लक्ष्मी ठाकुर, डॉ. विनोद टेकचांदनी, डॉ. ललित सुखीजा, डॉ. भारती प्रकाश, डॉ. चंदा केसवानी, डॉ. दिलीप रायसिंघानी, डॉ. दीप्ति रंगनानी सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी कर्मचारी उपस्थित रहे।
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