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January 9, 2026
क़ुल की रस्म के साथ ख़्वाजा साहब की साहिबज़ादि का उर्स सम्पन्न।
शुक्रवार सुबह 10 बजे गद्दीनशीन सैयद फख़र काज़मी चिश्ती साहब की सदारत में महफ़िल ए समाँ शुरू हुई, जिसमें फ़ारसी, उर्दू, ब्रज भाषा में कलाम गाए गए, अंत में आज रंग है री माँ बीबी हाफ़िज़ा जमाल घर रंग है री गाकर क़व्वाल ने अपनी अकिदत का इज़हार किया। दोपहर 12 बजे कुल की रस्म हुई जिसमें दस्तरख़्वान पढ़ा गया एवं फ़ातेहा ख़्वानि होने के बाद बढ़े पीर की पहाढ़ से ग़दरशाह ने तोप चलाईं दरगाह के मौरूसी अमले ने शादियाने बजाए इसी के साथ उर्स का समापन हुआ।
डॉ• सैयद राग़िब चिश्ती(अधिवक्ता) ने बताया कि बीबी हाफ़िज़ा ख़्वाजा साहब की चहिती बेटी थीं। वे जब पैदा हुईं तो ख़्वाजा साहब ने अपना लभ उन्हें चखा दिया था इसलिए उन्होंने बचपन में ही क़ुरान पढ़ कर सुना दिया था। तभी से उनको बीबी हाफ़िज़ा के नाम से जाना जाने लगा। उनकी दुआओं से बे औलाद को औलाद मिलती है। उन्होंने 850 वर्ष पूर्व हैपी वैली में चिल्ला किया था, हैपी वैली में नूर चश्मे में आज भी उनका चिल्ला मौजूद है। उन्होंने औरतों में दीन की बहुत ख़िदमत अंजाम दीं, वे घरों में जा कर औरतों को दिनी तालीम दिया करती थीं।
लुच्ची हलवे पर विशेष बीबी हाफ़िज़ा के नाम की नियाज़
सभी चिश्तिया ख़ानदान के लोग और तरिकत से जूढ़े लोग अपने - अपने घरों में लुच्ची हलवे पर नियाज़ दिलवाते हैं।ख़्वाजा साहब भी अपने पीर-ओ-मुर्शीद के उर्स पाक के बाद अपनी बेटी बीबी हाफ़िज़ा को उर्साने के रूप में तोहफ़े दिया करते थे। इसी रिवायत से सभी अपनी बहन बेटियों को उर्साने के रूप में तोहफ़े भेजते हैं।
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