For News (24x7) : 9829070307
RNI NO : RAJBIL/2013/50688
Visitors - 149886631
Horizon Hind facebook Horizon Hind Twitter Horizon Hind Youtube Horizon Hind Instagram Horizon Hind Linkedin
Breaking News
Ajmer Breaking News: आना सागर को बचाने के अभियान को लेकर 23 जुलाई को 'अजमेर बंद', डॉ. राजकुमार जयपाल के नेतृत्व में निकला विशाल पैदल मार्च |  Ajmer Breaking News: रिमझिम बारिश के बीच संभाग के सबसे बड़े जवाहरलाल नेहरू अस्पताल की ओपीडी में कैश काउंटर के पास अचानक छत का प्लास्टर गिर गया। |  Ajmer Breaking News: भाजपा ने कांग्रेस के चुनावी पासे को पलटा,शहर कांग्रेस ने आनासागर की दुर्दशा के खिलाफ 23 जुलाई को ’अजमेर बंद’ का आह्वान किया, |  Ajmer Breaking News: कथा वाचक किरीट भाई सोमैया द्वारा जवाहर रंगमंच पर गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष में आयोजित कथा के बीच खाटूश्याम बाबा पर की गई तथ्यहीन टिप्पणी का वीडियो वायरल होने के बाद श्याम भक्त आक्रोशित |  Ajmer Breaking News: अजमेर में डीएसटी  एवं दरगाह थाना पुलिस की बड़ी कार्रवाई, जुआ-सट्टा खेलते 27 सटोरिए दबोचे,₹60000 की नगदी और ताश पत्ती सहित जुआ सट्टा खेलने का सामान जप्त |  Ajmer Breaking News: एनएसयूआई छात्र संगठन के द्वारा आना सागर की दुर्दशा के खिलाफ चौपाटी पर अनोखा प्रदर्शन, |  Ajmer Breaking News: प्रधानमंत्री के विरोध में कांग्रेस का प्रदर्शन, छात्रों पर कथित लाठीचार्ज के खिलाफ पुतला दहन |  Ajmer Breaking News: बारिश से पहले एक्शन, तैनात रहेंगे 150 हॉर्स पावर के तीन पम्प, विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी ने दी सौगात |  Ajmer Breaking News: विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी की गरिमामयी उपस्थिति में निकली भगवान जगन्नाथ जी की भव्य रथयात्रा |  Ajmer Breaking News: अजमेर की ऐतिहासिक आनासागर झील की बदहाली और दुर्दशा पर प्रशासन व भाजपा की उदासीनता के खिलाफ 23 जुलाई को अजमेर बंद को सफल बनाए के लिए बैठक आयोजित | 

अंदाजे बयां: बड़ी मुश्किल से जो दरिया हुआ था, बदन में उसके सहरा चीख़ता था

Post Views 241

April 5, 2021

मैं अपनी जेब से ही गिर गया था, मुझे रूमाल मेरा ढूँढता था।

बड़ी मुश्किल से जो दरिया हुआ था,
बदन में उसके सहरा चीख़ता था।
मैं अपनी जेब से ही गिर गया था,
मुझे रूमाल मेरा ढूँढता था।
पराई आग शायद जल रही थी,
उसी पर हाथ मैंने रख दिया था।
मेरी पहचान उससे डर रही थी,
अजब से डर जो मुझमें छिप गया था।
ढहा जाता था मेरे टूटने पर,
मेरा घर मुझको कितना चाहता था।
खुली छत पर भी था बेचैन कितना,
न जाने कौन मुझको सोचता था।
कहाँ जाकर हुआ था गुम न जानें,
मुझे मेरे ही साया खोजता था।
     सुरेन्द्र चतुर्वेदी


© Copyright Horizonhind 2026. All rights reserved