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April 5, 2021
बड़ी मुश्किल से जो दरिया हुआ था,
बदन में उसके सहरा चीख़ता था।
मैं अपनी जेब से ही गिर गया था,
मुझे रूमाल मेरा ढूँढता था।
पराई आग शायद जल रही थी,
उसी पर हाथ मैंने रख दिया था।
मेरी पहचान उससे डर रही थी,
अजब से डर जो मुझमें छिप गया था।
ढहा जाता था मेरे टूटने पर,
मेरा घर मुझको कितना चाहता था।
खुली छत पर भी था बेचैन कितना,
न जाने कौन मुझको सोचता था।
कहाँ जाकर हुआ था गुम न जानें,
मुझे मेरे ही साया खोजता था।
सुरेन्द्र चतुर्वेदी