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अंदाजे बयां: भय बिनु हुई न प्रीत

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August 16, 2019

2160 *#मधुकर कहिन* 


 भय बिनु हुई न प्रीत


नरेश राघानी


 कल आजादी का पर्व मनाया गया और साथ ही रक्षाबंधन का भी। अजमेर में बाकी सब कार्यक्रमों के चलते कल के दिन के कुछ और भी *मायने* थे । बताएं कैसे ? वह मायने यह  कि *रात खबर आई की, प्रकृति ने रक्षाबंधन के पर्व का धर्म निभाते हुए ,अजमेर की प्यासी जनता का की रक्षा का अपना धर्म निभा दिया है ।और बहुत जल्द अजमेर को जल समस्या से आजादी मिलने की संभावना उत्पन्न हुई है।* बताएं कैसे ?  वह ऐसे कि *कल रात को 12:00 बजे की रिपोर्ट के अनुसार बीसलपुर बांध का पानी ,यदि एक और ढंग की बारिश हुई तो !!! बांध के ऊपर से छलक सकता है। या सरल भाषा में इसको कहिए कि बीसलपुर बांध पानी से लबालब भर चुका है।* 

 चुनाव के दौरान *अजमेर की प्यास बुझाने का वादे और बड़ी-बड़ी बातें करने वाले राजनेता , जो काम नहीं कर पाए वह काम ईश्वर की असीम अनुकंपा से प्रकृति ने कर दिया है ।* परंतु इसके बीच एक *रोड़ा* अभी भी बाकी है। और यह रोड़ा भी इन *निर्लज नेताओं की उदासीनता का ही नतीजा है।* क्योंकि बिसलपुर बांध का पानी जयपुर भेजने की योजना पर काम किया जा चुका है। यहां *यह कहिए कि जयपुर भेजा जा चुका है। इन परिस्थितियों में प्रकृति की असीम अनुकंपा का लाभ अजमेर वासियों को मिलना मुश्किल दिखाई दे रहा है।* मतलब अजमेर के नेता और जनप्रतिनिधि तो ऐसे *भस्मासुर* हैं जो जहां बैठेंगे *जिसको छू लेंगे उसको राख में तब्दील कर देंगे।* काश !!! बीसलपुर का बांध छलकने से पहले इन नेताओं को अकल आ जाए । और वह *थोड़ा पानी अजमेर की तरफ मोड़ दें।* 

 *लाशों और मुर्दों के शहर में वैसे तो ऐसी उम्मीद करना किसी नेता से करना पागलपन ही है। परंतु फिर भी साहब उम्मीद पर दुनिया कायम है।* जनता उम्मीद कर सकती है कि किसी न किसी जनप्रतिनिधि को अक्ल आएगी और अजमेर की प्यास बुझाई जाएगी। *वैसे तो इन नेताओं की खाल में कोई भी सुआ तो क्या ...  भाला तक नहीं घुस सकता ।* लेकिन फिर भी अगर *अजमेर की जनता थोड़ी सड़कों पर उतर कर यदि इन तथाकथित तारणहारों के गिरेबाँ पर हाथ डालेगी , और मालाओं की जगह इन्हें जूतों से सुशोभित करेगी तो शायद यह संभव हो ।* क्योंकि यह साफ दिखाई दे रहा है की *ऊपर वाले को तो अजमेर पर रहम आ गया   परंतु सत्ता के नशे में मदमस्त इन नेताओं की आंखों में अभी भी अजमेर की प्यासी जनता के लिए रहम नहीं आया है।*

 रामायण में जब भगवान राम सागर से प्रार्थना करने बैठे और कहा कि - *कृपया रास्ता छोड़ दे हमारी सेना को लंका जाना है। तो समुद्र भी इन्हीं नेताओं की तरह मदमस्त आंखें बंद करके सोया हुआ था । 3 दिन बाद भी जब समुद्र ने भगवान राम की नहीं मानी, तो विवश होकर भगवान राम ने अपनी कमान की प्रत्यंचा पर ब्रह्मास्त्र का संधान कर लिया और उसका रुख समुद्र की तरफ किया। जिसे देखकर समुद्र त्राहिमाम त्राहिमाम करता हुआ भगवान श्री राम के चरणों में आ पड़ा। तब जाकर समुद्र ने रास्ता दिया।* 

 बिल्कुल इसी तर्ज पर अजमेर की *जनता को अब अपनी हिम्मत की कमान पर गुस्से का ब्रह्मास्त्र संधान कर लेना चाहिए। अन्यथा इस बेशर्म राजनीतिक जमात की आंखें नहीं खुलेगी ।* फिर गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रसंग के लिए रामायण में ठीक ही तो कहा है -


 *बिनय न मानत जलधि गए तीनि दिन बीति।* 

 *बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥* 



जय श्री कृष्ण


नरेश राघानी

प्रधान संपादक

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