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March 13, 2021
तो क्या मज़हब पढ़ाते हैं परिन्दे,
दुआ देना सिखाते हैं परिन्दे।
हवाओं से मुलाक़ातों की ख़ातिर,
मुझे छत पर बुलाते हैं परिन्दे।
वो पहले तोलते हैं बालो पर फिर,
मुझे ऊँचा उड़ाते हैं परिन्दे।
दबे पाओं से आ तन्हाइयों में,
मुझे मुझसे चुराते हैं परिन्दे।
कई सूखे शजर बतला रहे हैं,
कई रिश्ते निभाते हैं परिन्दे।
मेरी ग़ज़लों से जब करते हैं बातें,
मुझे अपना बताते हैं परिन्दे।
ख़ुदा से गुफ़्तगू होती है उनकी,
बहुत बातें बनाते हैं परिन्दे।
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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