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क़लमकार: डॉ रघु शर्मा जी फिर एक बार जाएं नसीराबाद के सरकारी अस्पताल और देखें वहाँ लुहार कर रहे हैं मोची का काम

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December 16, 2020

देखें कि आपने जो आदेश दिए थे वे कैसे डस्ट बिन में चले गए

डॉ रघु शर्मा जी फिर एक बार जाएं नसीराबाद के सरकारी अस्पताल और देखें वहाँ लुहार कर रहे हैं मोची का काम



देखें कि आपने जो आदेश दिए थे वे कैसे डस्ट बिन में चले गए



आक्सीजन प्लान्ट छोड़ रहा है कार्बनडाईऑक्ससाइड



रैफर हो रहे हैं मरीज़,वेंटीलेसशन पर हैं डॉक्टर्स और अस्पताल



सुरेन्द्र चतुर्वेदी



चिकित्सा मंत्री डॉ रघु शर्मा का अजमेर एहसानमंद है कि उन्होंने संभाग के सबसे बड़े नेहरू अस्पताल को रखरखाव के लिए अतिरिक्त बजट स्वीकृत किया है। यही नहीं इस जिले के अन्य अस्पतालों में भी वायरिंग, फायर फाइटिंग सिस्टम और विभिन्न विकास कार्य करवाए जा सकेंगे। उन्होंने जनाना अस्पताल व मेडिकल कॉलेज के लिए भी विशेष राशि आवंटित की है।



एक ओर डॉ रघु शर्मा जहां जिले के अस्पतालों की अव्यवस्थाओं को व्यवस्थाओं में तब्दील करने की बात कर रहे हैं, वहीं जिले के कई अस्पतालों के हाल इतने खराब हैं कि वे सिर्फ खिलौने बनकर रह गए हैं।वहाँ मरीज़ जिंदा तो जाते हैं मगर मर कर लौटते हैं ।वहां मरीज़ों को न इंसान समझा जाता है न उनको ज़रूरी सुविधाएं ही उपलब्ध हो पाती हैं।




किशनगढ़ का यज्ञ नारायण अस्पताल हो या ब्यावर का अमृत कौर अस्पताल या नसीराबाद का सरकारी अस्पताल यहां से तो पशु चिकित्सालय भी ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं।



इनमें भी सबसे बुरी हालत नसीराबाद के सरकारी अस्पताल की है ,जहां हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं ।



नसीराबाद के इस अस्पताल के लिए मैंने अब तक कई ब्लॉग लिखे। चिकित्सा मंत्री डॉ रघु शर्मा को मैंने व्यक्तिगत रूप से अस्पताल का दौरा करने का सुझाव दिया। वे गए भी। उन्होंने स्वयं माना कि अस्पताल के हालात संतोषजनक नहीं ।उन्होंने कई निर्देश दिए। एक बार तो ऐसा लगा कि जैसे राम ने अस्पताल की शिला पर कदम रख कर उस में जान फूंक दी है।वह पुनर्जीवित होकर अहिल्या का रूप धारण कर लेगी मगर अफसोस दिल खड्डे में है।



यह अस्पताल डॉ रघु शर्मा की नेक नियत के बावजूद वैसे का वैसा ही है।



कोटा रोड पर बना ये अस्पताल खुद पिछले कई सालों से बीमार पड़ा है। वेंटिलेशन पर है ।चिकित्सालय में डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों का कई दिनों तक नंबर ही नहीं आता। अस्पताल कागजों में 150 बेड का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल जरूर है मगर मौके पर मुश्किल से 50 बेड भी ढ़ंग क नजर नहीं आते हैं ।जो बेड केकड़ी के जिला अस्पताल भिजवा दिए गए उन्हें तो जैसे गाय ही खा गई है ।




यहां ओपीडी व प्रयोगशाला के हालात सबसे बुरे हैं । ओपीडी हर रोज 9 बजे खुल जाती है। ठंड में बुजुर्ग और मरीज़ लंबी-लंबी कतारों में खड़े भी नज़र आते हैं, मगर डॉक्टरों का कहीं कोई पता नहीं होता। डॉक्टर कभी 11बजे से पहले नहीं पहुंच पाते। अस्पताल की प्रयोगशाला में भी देर सुबह तक ताला लगा रहता है। प्रभारी जी पता नहीं कब कहां से रेंगते हुए पहुंचते हैं ।लैब में तैनात कर्मचारियों और डॉक्टर्स के लिए भी समय का कोई प्रतिबंध नहीं।



स्थानीय विधायक रामस्वरूप लांबा इस अस्पताल को लेकर बहुत संवेदनशील नज़र आए। उन्होंने एक बार, हाँ शायद सिर्फ एक बार चिकित्सा मंत्री डॉ रघु शर्मा को अपने लेटर पैड पर पत्र लिख दिया। आप इससे ज्यादा शायद कुछ कर भी नहीं सकते ।सरकार में जो नहीं ।



पूर्व विधायक रामनारायण गुर्जर भी पत्र लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर चुके हैं ।



विगत कुछ माह पूर्व पत्रकार अतुल सेठी की मौत का मामला बहुत गरमाया था ।राज्य भर के पत्रकारों ने रोष व्यक्त किया था। अस्पताल के ऑक्सीजन प्लांट को लेकर नागरिकों ने भी बहुत हाय तौबा मच आई थी। मगर हुआ कुछ भी नहीं।



डॉ रघु शर्मा को अधिकारियों ने भरोसा दिलाया था कि शीघ्र ही प्लांट शुरू हो जाएगा ।परंतु ऑक्सीजन प्लांट ज्यों का त्यों पड़ा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ रहा है ।



संयुक्त निदेशक डॉ इंद्रजीत सिंह भी गलती से पिछले दिनों इस अस्पताल में आ गए थे।उन्होंने ओपीडी प्रयोगशाला और वार्डों का दौरा किया था ।उन्होंने अस्पताल प्रबंधन के समक्ष अपनी नाराज़गी भी व्यक्त की थी ।डॉ रघु शर्मा की तर्ज़ पर उन्होंने भी शीघ्र व्यवस्थाओं को पटरी पर लाने के आदेश दिए थे। उन्होंने भी नेत्र विभाग में बेशकीमती उपकरणों और मशीनों के चोरी हो जाने का पर भी नाराज़गी जताई थी। भरोसा दिलाया था कि चोरी गए उपकरणों की जांच होगी, मगर उनके जाते ही अस्पताल प्रबंधन फिर वैसे ही हो गया जैसे नज़र फिरते ही भैंस पानी में चली जाती है ।कोई जांच हुई और ना होगी , क्योंकि जिन्होंने मशीन चुराई वे बाहर के नहीं अंदर के ही लोग हैं




कहने को तो इस अस्पताल में 27 डॉक्टर तैनात हैं मगर एक भी फिजिशियन नहीं , एक भी नेत्र विशेषज्ञ नहीं, एक भी महिला विशेषज्ञ नहीं ।यह बात मैं पिछले 1 साल से कई ब्लॉग्स में लिख चुका हूं मगर सरकार के कानों में जू तक नहीं रेंगी।



जब शल्य चिकित्सक किसी फिजीशियन की जगह बैठे हों तो लगता है कि लोहारों से मोची का काम करवाया जा रहा है। इस अस्पताल में सिर्फ फिजीशियन ही नहीं ,नेत्र , हड्डी और महिला विभाग सभी अपने विशेषज्ञों का इंतजार कर रहे हैं ।



सच तो ये है कि यहां उन्हीं बीमारियों का इलाज़ होता है जिन बीमारी की दवा आप वैसे भी मेडिकल स्टोर पर मांगने से ले सकते हैं।




यह एक रेफरल अस्पताल है जिस पर सरकार हर माह करोड़ों रुपए खर्च कर रही है।क्या मेरे इस ब्लॉग को डॉ रघु शर्मा पढ़ कर कुछ सकारात्मक आदेश दे पाएंगे


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