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October 5, 2020
मंत्री रघु शर्मा पहुंचे नसीराबाद: गए तब तो सब चाक चौबंद: लौटे तो सब बंटा धार
पैसा खिला के आये हैं तो पैसा कमा कर ही जाएँगे
ज़िले भर का एक विधायक नहीं जो अस्पताल जाकर वॉर्डों के हाल देखे
पढ़ें सबका कच्चा चिट्ठ
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
एक बात जिले में ठीक हुई। नसीराबाद में चिकित्सा मंत्री डॉ रघु शर्मा सरकारी अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंच गए। पत्रकार अतुल सेठी की मौत के बाद पत्रकार बराबर मांग कर रहे थे कि सरकारी अस्पताल का बिगड़ा हुआ ढर्रा सुधारा जाए।
सी एम एच ओ ,के के सोनी को साथ लेकर डॉ रघु शर्मा ने विभिन्न दृष्टिकोण से जांच पड़ताल की ।जिस प्रकार सेठी जी की मौत ऑक्सीजन गैस की कमी के कारण हुई उस पर उन्होंने तत्काल बंद पड़े प्लांट को लेकर दिशा-निर्देश दिए। कुछ चिकित्सकों की क्लास भी ली
नसीराबाद के लिए यह एक सुखद खबर हो सकती है। डॉ रघु शर्मा आए इसके लिए उन्हें धन्यवाद भी दिया जा सकता है मगर मुझे पता है कि नकारा चिकित्सा प्रशासन सिर्फ उस समय चाक चौबंद होता है जब कोई मंत्री या उच्च अधिकारी निरीक्षण के लिए आता है ।ऐसा नाटक किया जाता है जैसे निरीक्षण के बाद सारी व्यवस्थाएं दुरुस्त कर दी जाएगी मगर सच्चाई अलग होती है ।मंत्री जी के जाने के तत्काल बाद ही नसीराबाद के अस्पताल ने चैन की सांस ले ली है।जो चिकित्सा कर्मी मंत्री जी के सामने हाथ जोड़े उनके आगे-पीछे घूम रहे थे, वे उनके जाते ही मूँछें तानकर पुराने ढर्रे पर आ गए हैं ।
डॉक्टरों की गर्मी अभी भी बरकरार है। खुलेआम कह रहे हैं कि पैसा खिलाकर आए हैं ।उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसके लिए वे किसी राजेंद्र नाम के व्यक्ति का ज़िक्र भी करते हैं ।कहते हैं कि जब तक राजेंद्र जी हैं कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता । वैसे दोस्तों यदि वे मुस्तैदी से काम करें तो कोई बेकार में उनका बिगाड़ना भी क्यों चाहेगा? किसी के पेट में दर्द तो है नहीं जो उनका बिगाड़ कर ठीक हो जाए दरअसल ,यदि यह बात सत्य है कि उनकी पोस्टिंग पैसा खिलाकर हुई है तो वे इस बात का पूरा फायदा तो उठाएंगे ही जितना देकर आए हैं, उससे ज्यादा तो कमाएंगे ही
आज़ादी के 70 सालों बाद चिकित्सा विभाग में हलवा खाने और हलवा खिलाने की परंपरा है ।शासन में सत्ता किसी भी पार्टी की रही हो नसीराबाद का सरकारी अस्पताल पोपा बाई की सराय ही बना रहा। यहां अब किसी राजनेता की नहीं चलती।
स्थानीय विधायक रामस्वरूप लांबा की तो बिल्कुल नहीं वे अपने पिता की तरह राजनीतिक तेवर नहीं जानते। उन्हें भोला तो नहीं कहा जा सकता मगर पिता जैसी बुद्धि और आक्रामक शैली उनके पास नहीं है । यही वजह है कि सरकारी अस्पताल पर ही नहीं ,उनकी अपने विधानसभा क्षेत्र के किसी भी विभाग में नहीं चलती। सरकार में तो पहले से ही तवा उल्टा है।
नसीराबाद में जो स्थिति विधायक लाम्बा की है वही स्थिति किशनगढ़ में विधायक सुरेश टांक की है मगर लांबा और उनमें एक बहुत बड़ा अंतर है ।अब सुरेश टांक बिना सत्ता के काम करना सीख गए हैं ।वे अपने बलबूते पर अपनी सूझबूझ से, अपनी दूरदर्शिता से काम कर रहे हैं। कहने को वे सत्ता पार्टी कांग्रेस के साथ हैं मगर पिछले दिनों की बाड़े बंदी में उन्होंने खुद को शंकाओं में ला दिया ।अब राज्य सरकार उनके विशेष अधिकारों को हिकारत से देख रही है।
ऐसे में किशनगढ़ के विकास की रफ़्तार वे अपने बलबूते पर चला रहे हैं। मार्बल व्यापारी मंदिर विवाद हो या ड्रीम प्रोजेक्ट सड़क का निर्माण वे क़ामयाबी से शुरू करवा चुके हैं।
किशनगढ़ में यूँ भी कांग्रेस के चमचों का प्रभाव है ।यज्ञ नारायण अस्पताल पर इन चमचों का वर्चस्व है। यही वजह है कि सुरेश टांक अस्पताल से दूरी बनाए हुए हैं
पुष्कर के विधायक सुरेश रावत भी अस्पताल की हालत सुधारने की दिशा में कोई खास काम कर नहीं पाए हैं। अपने विधानसभा के विकास की दशा सुधारने में उनकी हालत भी वैसी ही है जैसे किसी विपक्षी पार्टी के विधायक की होती है ।विपक्ष में होने के कारण सत्ता से वे केवल विकास के लिए लड़ सकते हैं ,और वे लड़ भी रहे हैं ।
पुष्कर का विकास जैसे तैसे बहुत तेजी से ना भी हो, धीमी रफ्तार से ही सही चल तो रहा है
ब्यावर के विधायक शंकर सिंह रावत का ब्यावर को जिला बनाए जाने का नशा चढ़ा हुआ है ।सत्याग्रह और पद यात्राओं की नाकामयाबी के बाद अब वे क्या करेंगे, वही जाने ।
गहलोत भैया ने उन्हें दिलासे की एक रंगीन लॉलीपॉप पकड़ा दी है जिसे वे चूंसने का मजा ले रहे हैं ,और अस्पताल में झांक कर देख तक नहीं रहे
पूरा ब्यावर जानता है कि चिकित्सा विभाग और प्रशासन पर उनकी पकड़ रत्ती भर भी नहीं है। देहात भाजपा अध्यक्ष देवीशंकर भूतड़ा पहले से ही अपने विरोधियों की बगावत और शारीरिक आपदाओं को झेल रहे हैं।
मसूदा विधायक राकेश पारीक यधपि कांग्रेस में हैं।सत्ता पार्टी में।उनकी हालत बेहतर होनी चाहिए थी मगर वे तो निर्दलीय सुरेश टांक से भी गए बीते साबित हो रहे हैं ।उनको न तो प्रशासन गाँठ रहा है ना ही सरकार। सचिन पायलट के पट्ठे ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है ।श्री सीमेंट के भरोसे ही उनके दिन गुज़र रहे हैं
अजमेर के दोनों विधायक भाई बहन भाऊ बली और भदेल ने भी आज तक सरकारी अस्पतालों में जाकर वहां की व्यवस्थाएं नहीं देखीं। बस बाहर से ही नारे लगाते रहे। जनता के दुख-दर्द को लेकर वे सिर्फ बयानबाज़ी तक ही सीमित रहते हैं ।अखबारों में रहने से कोरोना के संकमण का डर नहीं रहता।इसलिए दोनों नेता अस्पताल से दूरी बनाए रखते हैं।
अजमेर जिले की स्थिति भयावह है। हालात बिगड़ते जा रहे हैं। राजनेताओं ने ,प्रशासन ने , चिकित्सा विभाग ने अपने अपना पल्ला झाड़ लिया है ।
मित्रों बचना है तो खुद बचाव करो अब तो यही रास्ता बचा है
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