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June 8, 2017
जयपुर। जो पहले कभी न हो सका, वे काम इन दिनों प्रदेश भर में चलाए जा रहे राजस्व लोक अदालत अभियान-न्याय आपके द्वार के शिविरों में हो रहे हैं। न कोई वकील, न मध्यस्थ, और न ही पैसे का काम। ग्रामीणों के पुराने से पुराने काम चन्द घण्टों में ऎसे हो रहे हैं जिसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता। मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की मंशा के अनुरूप ग्राम्य उत्थान और ग्रामीणों के बहुआयामी कल्याण की धाराओं को तेज करने समूचे राजस्थान में चल रहे इन शिविरों में हर रोज उपलब्धियां हासिल हो रही हैं। और रोजाना ग्रामीणों की दुआओं का भण्डार बढ़ता ही चला जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों यह अभियान लोकप्रियता पर है। सरकार के उद्देश्यों के अनुरूप राजसमन्द जिले में भी जिला प्रशासन, उपखण्ड प्रशासन और ग्राम्य प्रशासन मिलकर इन शिविरों को आशातीत सफलता देने के लिए अहर्निश पूरी मानवीय संवेदना और ग्राम्य मंगल की भावना से जुटे हुए हैं। इनमें जन प्रतिनिधियों से लेकर राजस्व महकमे, विभिन्न विभागों और आम ग्रामीणों की आत्मीय भागीदारी शिविरों की सफलता का परचम फहरा रही है। शिविरों में कई पेचीदा और रोचक मामलों का निस्तारण भी देखने लायक है जो पूरे परिवार के लिए खुशियों की सौगात लाकर सुकून का दरिया उमड़ाता रहा है।राजसमन्द पंचायत समिति अन्तर्गत धायला ग्राम पंचायत मुख्यालय पर आयोजित राजस्व लोक अदालत अभियान - न्याय आपके द्वार में एक ऎसे मामले का पटाक्षेप हुआ जिसने तीन पीढ़ियों को सुकून दिया। मामला देवपुरा गांव का है जहां के 80 वर्षीय बुजुर्ग पेमा पुत्र भेरा भील को लगभग 40 साल पूर्व 5 बीघा भूमि आवंटित हुई। आज से 15 वर्ष पूर्व पेमा की यह जमीन उसी गांव के अन्य खातेदार मांगीदास पुत्र सालगदास बैरागी के खाते में दर्ज हो गई। पेमा को इस बात का पता नहीं लगा। पेमा की पत्नी भोलीबाई लकवाग्रस्त होने की वजह से घर में ही रहती है। पेमा के कोई औलाद नहीं होने पर उसने अपने भानजे अमरा को पैदा होते ही गोद रख लिया। अब भांजा अमरा और उसके बच्चों द्वारा दोनों बुजुर्गों की देखभाल एवं सारी व्यवस्थाएं की जा रही हैं। भेड़-बकरी पाल कर तथा मामूली खेती पर साथ-साथ रह रही तीनों पीढ़ियों का परिवार चल रहा है। इसी बीच महात्मा गांधी नरेगा में किसी व्यक्तिगत कार्य के लिए चाही जा रही जमीन की नकल पाने के लिए पेमा का पोता रूपलाल जब ग्राम पंचायत के उपसरपंच जगदीश प्रजापत से मिला और अपनी बात कही। उप सरपंच प्रजापत ने कम्प्यूटर पर अपना खाता पोर्टल खोलकर देखा और बताया कि पेमा बा के खाते में टुकड़े-टुकड़े में 2 बीघा से कुछ ज्यादा जमीन ही दर्ज है। यह देखकर रूपलाल के पैरों के तले से जमीन खिसक गई क्योंकि उसके दादा के खाते में 7 बीघा जमीन आती है। घर जाकर उसने यह बात बताई तो परिवार हैरान हो उठा। पोते से ज्यादा दुःख दादा को हुआ क्योंकि इसी जमीन की आस में वृद्धावस्था भुगत रहे दोनों पति-पत्नी की सेवा-चाकरी चल रही थी। इस स्थिति में घबराए हुए ये लोग पटवारी से मिले और उसे मौके पर ले गए जहाँ जनजाति वर्ग के पेमा बा का कब्जा था। पटवारी ने पेमा की पुरानी कृषि पास बुक के आधार और खोजबीन कर पता लगाया कि पेमा के खाते और कब्जे की जमीन उसी गांव के मांगीदास के नाम गलती से चढ़ गई है। इस बारे में पूछे जाने पर मांगीदास ने पटवारी को बताया कि उसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं है कि पेमा बा की जमीन उसके खाते में कैसे आ गई।सभी पुरानी नकलों व दस्तावेजों के साथ यह सारा पेचीदा मामला हाल ही धायला ग्राम पंचायत मुख्यालय पर लगे राजस्व लोक अदालत अभियान - न्याय आपके द्वार शिविर में शिविर प्रभारी, उपखण्ड अधिकारी राजेन्द्रप्रसाद अग्रवाल के समक्ष आया। उन्होंने तसल्ली से पूरे प्रकरण को सुना व दस्तावेजों को देखा। इस मामले में पेमा के खाते में संशोधन किया जाकर नई नकल जारी की गई। इस रोचक मामले में कागजों में गायब हो चुकी अपनी खोई हुई जमीन को प्राप्त कर तीनों पीढ़ियों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बिना कोई वकील किए, बिना कोई पैसा खर्च किए जो काम हो गया उसकी खुशी दादा से लेकर पोते तक के चेहरों पर तैरती नज़र आयी। अस्सीपार बुजुर्ग पेमा भील के मुँह से यह उद्गार निकल आए - हाऊ काम वियो। सरकार रो लाख-लाख धन्यवाद।
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