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September 20, 2026
प्रदेश के 309 नगरीय निकायों के चुनाव के बाद मेयर-सभापति-अध्यक्ष पदों का गणित बदला, प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार 33 निकायों में मुकाबले की नौबत नहीं आई, इनमें 30 भाजपा, 2 कांग्रेस और एक भाजपा समर्थित बोर्ड शामिल
जयपुर। राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव-2026 में वार्डों के नतीजों के बाद अब नगर निगमों, नगर परिषदों और नगरपालिकाओं के प्रमुख पदों की तस्वीर भी साफ होने लगी है। भाजपा के प्रत्याशी 30 निकायों में मेयर, सभापति या अध्यक्ष पद पर निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। अलग-अलग प्रकाशित रिपोर्टों में कुल 33 निकायों में बिना मुकाबले बोर्ड बनने का आंकड़ा दिया गया है। इसमें 30 भाजपा, 2 कांग्रेस और एक भाजपा समर्थित बोर्ड को शामिल किया गया है।ऐतिहासिक तुलना में यह संख्या पिछली अशोक गहलोत सरकार के 2018 से 2023 के कार्यकाल के दौरान बने निर्विरोध बोर्डों से काफी अधिक बताई जा रही है। प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार उस पांच साल की अवधि में 11 निकायों में प्रमुख पद निर्विरोध तय हुए थे—इनमें 6 कांग्रेस, 3 भाजपा और 2 निर्दलीय खेमे के थे। मौजूदा चुनाव में यह आंकड़ा 33 तक बताया गया है।
एक जरूरी अंतर: 32 सीधे निर्विरोध, 33 में एक भाजपा समर्थित बोर्ड भी शामिल
निर्विरोध बोर्डों की संख्या को लेकर रिपोर्टों में मामूली अंतर भी सामने आया है। एक चुनावी रिपोर्ट में 32 निकाय प्रमुख सीधे निर्विरोध निर्वाचित बताए गए हैं—इनमें भाजपा के 30 और कांग्रेस के 2 प्रत्याशी शामिल हैं। दूसरी रिपोर्टें एक अतिरिक्त भाजपा समर्थित बोर्ड को जोड़ते हुए कुल संख्या 33 बता रही हैं। इसलिए 33 का आंकड़ा बताते समय यह अंतर स्पष्ट रखना जरूरी है।
इस लिहाज से भाजपा के अधिकृत प्रत्याशियों के निर्विरोध निर्वाचन का सत्यापित प्रकाशित आंकड़ा 30 है। भीलवाड़ा और भरतपुर जैसे बड़े निकायों सहित कई नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में भाजपा प्रत्याशी के सामने अंतिम रूप से कोई दूसरा उम्मीदवार मैदान में नहीं रहा।
309 निकायों में हुए चुनाव, 10 नगर निगम भी शामिल
राजस्थान में इस बार प्रशासनिक पुनर्गठन के बाद कुल 309 नगरीय निकायों में चुनाव कराए गए। इनमें 10 नगर निगम, 47 नगर परिषद और 252 नगरपालिकाएं शामिल थीं। वार्ड सदस्यों के लिए मतदान 9 और 11 सितंबर को हुआ और मतगणना 14 सितंबर को कराई गई।
वार्ड स्तर पर भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, लेकिन कई निकायों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और बड़ी संख्या में निर्दलीय पार्षद चुने गए। यही कारण है कि वार्डों का चुनाव परिणाम और बाद में बनने वाला बोर्ड कई जगह अलग राजनीतिक तस्वीर पेश कर रहा है।
भरतपुर-डीग में सबसे दिलचस्प रहा चुनावी गणित
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह क्षेत्र भरतपुर और पड़ोसी डीग में चुनाव परिणाम खास तौर पर दिलचस्प रहे। यहां वार्ड चुनाव में भाजपा से ज्यादा मजबूत प्रदर्शन निर्दलीय प्रत्याशियों ने किया था। दोनों जिलों के 13 नगरीय निकायों के 415 वार्डों में निर्दलीयों ने 262 सीटें यानी करीब 63.1 प्रतिशत वार्ड जीते। भाजपा को 131 वार्ड और कांग्रेस को 19 वार्ड मिले।
भरतपुर जिले के सात निकायों में निर्दलीयों ने 235 में से 152 वार्ड जीते, जबकि डीग जिले में 180 में से 110 वार्ड निर्दलीयों के खाते में गए। यानी वार्ड परिणामों के आधार पर यह क्षेत्र भाजपा की एकतरफा जीत नहीं था।
हालांकि मेयर और अध्यक्ष पद की चुनावी प्रक्रिया आते-आते समीकरण बदल गए। प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया है कि निर्दलीय पार्षदों के समर्थन और राजनीतिक समझौतों के बाद भरतपुर-डीग क्षेत्र की करीब 90 प्रतिशत नगरपालिकाओं में भाजपा या भाजपा समर्थित बोर्ड बनने की स्थिति बनी।
वार्ड में निर्दलीय जीते, बोर्ड बनाने में भाजपा को मिला समर्थन
भरतपुर-डीग का उदाहरण यह भी बताता है कि किसी निकाय में किस पार्टी के कितने पार्षद जीते और आखिर में किस दल का बोर्ड बना—दोनों आंकड़ों को अलग-अलग समझना जरूरी है।उदाहरण के लिए भरतपुर नगर निगम के 65 वार्डों में निर्दलीय 36 सीटों पर जीते, जबकि भाजपा के 20 और कांग्रेस के 7 पार्षद निर्वाचित हुए। इसके बावजूद बाद की राजनीतिक प्रक्रिया में निर्दलीय पार्षदों के समर्थन ने बोर्ड गठन का समीकरण बदल दिया।इसी तरह डीग, कामां, पहाड़ी, सीकरी, नदबई, रूपवास, उच्चैन और बयाना सहित कई निकायों में बड़ी संख्या में निर्दलीय पार्षद चुने गए थे। बाद में इनमें से कई स्थानों पर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में समर्थन बनने की खबरें सामने आईं।
भाजपा इसे सरकार के प्रति समर्थन बता रही
भाजपा नेताओं ने 30 निकाय प्रमुखों के निर्विरोध निर्वाचन को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की रणनीति, पार्टी संगठन और राज्य सरकार के कामकाज के प्रति समर्थन के रूप में पेश किया है। कुछ भाजपा नेताओं ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शर्मा के नेतृत्व में जनता के विश्वास का संकेत बताया है। यह भाजपा का राजनीतिक आकलन है।
इसके विपरीत केवल निर्विरोध निर्वाचन के आंकड़े के आधार पर इसे सीधे पूरे राज्य के मतदाताओं का सरकार के कामकाज पर फैसला मानना सावधानी से देखा जाना चाहिए। कई निकायों में निर्विरोध प्रमुख का चुनाव वार्ड नतीजों के बाद पार्षदों और निर्दलीयों के समर्थन से तय हुआ है, जबकि वार्ड चुनावों में मतदाताओं ने अलग-अलग दलों और बड़ी संख्या में निर्दलीयों को चुना। भरतपुर-डीग में ही करीब दो-तिहाई वार्ड निर्दलीयों ने जीते थे।
पिछली गहलोत सरकार में 11 निर्विरोध बोर्ड
2018 से 2023 तक कांग्रेस सरकार के कार्यकाल को लेकर उपलब्ध प्रकाशित तुलना के मुताबिक कुल 11 स्थानीय निकायों में बोर्ड या निकाय प्रमुख बिना मुकाबले तय हुए थे। इनमें कांग्रेस के 6, भाजपा के 3 और निर्दलीय खेमे के 2 बोर्ड बताए गए हैं।वर्तमान चुनाव में सीधे भाजपा के 30 प्रत्याशियों का निर्विरोध चुना जाना इस संख्या से काफी अधिक है। हालांकि दोनों अवधियों की सीधी तुलना करते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि इस बार एक साथ 309 निकायों में चुनाव हुआ, जबकि पिछली अवधि में चुनावों की संख्या और चरण अलग थे। इसलिए राजनीतिक दल इसे अपने-अपने तरीके से व्याख्यायित कर रहे हैं।
21 सितंबर को बाकी निकायों में होगा शक्ति परीक्षण
जहां प्रमुख पद निर्विरोध तय नहीं हुए हैं, वहां अब मतदान से फैसला होगा। कई नगर निगमों, नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में भाजपा, कांग्रेस तथा निर्दलीय प्रत्याशी आमने-सामने हैं। इन चुनावों में निर्वाचित पार्षद मतदान करेंगे और उसके बाद मेयर, सभापति तथा नगरपालिका अध्यक्ष तय होंगे।ऐसे में 30 भाजपा प्रत्याशियों के निर्विरोध निर्वाचन ने पार्टी को शुरुआती बढ़त जरूर दी है, लेकिन राजस्थान के सभी निकायों की अंतिम राजनीतिक तस्वीर शेष प्रमुख पदों के चुनाव पूरे होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
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