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May 31, 2017
रिपोर्ट -मद्रास उच्च न्यायालय ने वध के लिए पशुओं की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी लगाने वाली केंद्र की अधिसूचना पर आज चार हफ्तों के लिए रोक लगा दी और इस सिलसिले में दायर जनहित याचिकाओं पर उसका जवाब मांगा। दरअसल, जनहित याचिकाओं (पीआईएल) में यह दलील दी गई है कि इन नये नियमों के लिए सर्वप्रथम संसद की मंजूरी लेनी चाहिए थी।
न्यायमूर्ति एम वी मुरलीधरन और न्यायमूर्ति सी वी कार्तिकेयन की मदुरै पीठ ने दो याचिकाओं पर अंतरिम आदेश जारी किया, जिनमें कहा गया था कि नियमों को रदद किया जाना चाहिए क्योंकि वे संविधान के खिलाफ हैं, परिसंघ के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं और मूल कानून-जंतु निर्ममता निवारण अधिनियम 1960 के विरोधाभासी हैं। याचिकाकतार्ओं की यह दलील कि अधिसूचना भोजन से जुड़ी है और इसलिए इसके लिए संसद की मंजूरी लेनी होगी, का जिक्र करते हुए न्यायाधीशों ने केंद्र से चार हफ्ते के अंदर दाखिल किए जाने वाले अपने जवाबी हलफनामे में इस बिंदु पर भी जवाब देने को कहा।
अदालत का यह आदेश ऐसे समय आया है जब केरल, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी की राज्य सरकारें तथा कई गैऱ़भाजपा पार्टियां केंद्र के फैसले का विरोध कर रही हैं।
प्रतिबंध के खिलाफ पिछले कुछ दिनों से केरल और तमिलनाडु के कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि यह लोगों की खान-पान की आदत के खिलाफ है। नये नियमों को केंद्रीय पयार्वरण मंत्रालय ने अधिसूचित किया है जो बूचड़खानों के लिए या धार्मिक उददेश्यों के लिए पशुओं की बलि को लेकर बैल, गाय, उंट की खरीद फरोख्त को प्रतिबंधित करता है।
याचिकाकतार्ओं ने कहा कि नये प्रावधानों की अधिसूचना 23 मई को जारी की गई जब अदालतें अवकाश पर थी। ऐसे नियमों पर संसद में चचार् होनी और उसकी मंजूरी लेनी चाहिए। पशुओं की खरीद फरोख्त पर पाबंदी लगाने वाले निमय संविधान के तहत मिली धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
उन्होंने कहा कि भोजन (मांसाहारी या शाकाहारी) पसंद करने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विवेक तथा निजता के अधिकार का हिस्सा है।
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