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March 11, 2025
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने 13 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात (अबॉर्शन) की अनुमति दे दी। जस्टिस सुदेश बंसल की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पीड़िता को जबरन डिलीवरी के लिए मजबूर करना उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है।
अदालत ने कहा – गर्भपात न होने से जीवनभर की पीड़ा होगी
बच्चे के भरण-पोषण और मानसिक स्वास्थ्य जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने महिला चिकित्सालय सांगानेर, जयपुर की अधीक्षक को मेडिकल बोर्ड के जरिए अबॉर्शन कराने के निर्देश दिए।कोर्ट ने माना कि पीड़िता को डिलीवरी के लिए मजबूर करने से वह जीवनभर मानसिक पीड़ा झेलेगी।अगर भ्रूण जीवित बचता है, तो राज्य सरकार उसके पालन-पोषण का खर्च वहन करेगी।यदि भ्रूण जीवित नहीं रहता, तो डीएनए रिपोर्ट के लिए उसके टिश्यू सुरक्षित रखे जाएंगे।
पीड़िता के माता-पिता थे गर्भपात के पक्ष में
पीड़िता की वकील सोनिया शांडिल्य ने बताया कि पीड़िता 27 हफ्ते 6 दिन (लगभग 7 माह) की गर्भवती थी।माता-पिता भी गर्भपात के पक्ष में थे और इसे लेकर कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।कोर्ट को बताया गया कि देशभर में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने 28 सप्ताह तक की गर्भावस्था में भी अबॉर्शन की अनुमति दी है।
मेडिकल रिपोर्ट में ‘हाई रिस्क’ के बावजूद गर्भपात संभव
पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने तीन विशेषज्ञों के मेडिकल बोर्ड से रिपोर्ट मांगी थी।8 मार्च को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया कि केस हाई-रिस्क है, लेकिन गर्भपात संभव है।अदालत ने इस रिपोर्ट के आधार पर गर्भपात की अनुमति दे दी।
क्या कहता है कानून?
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट 1971 और 2020 संशोधन
24 हफ्ते तक गर्भपात के लिए अदालत की अनुमति जरूरी नहीं होती। 24 हफ्ते के बाद कोर्ट और मेडिकल बोर्ड की मंजूरी आवश्यक होती है। यह कानून रेप पीड़िताओं, नाबालिग लड़कियों, विवाहित महिलाओं और दिव्यांग महिलाओं को गर्भपात की सुविधा प्रदान करता है।
हाईकोर्ट ने पहले भी दिशा-निर्देश जारी करने की जताई थी मंशा
दिसंबर 2024 में राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा था कि रेप पीड़िताओं को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूक नहीं किया जाता।पुलिस और संबंधित एजेंसियां उन्हें इस विषय में उचित जानकारी नहीं देतीं, जिससे कई बार महिलाएं और नाबालिग लड़कियां न चाहते हुए भी बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर हो जाती हैं।कोर्ट ने तब कहा था कि जल्द ही इस विषय पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।
राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले ने पीड़ित नाबालिग के अधिकारों की रक्षा की है और यह महिला अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय साबित हो सकता है। अब देखना होगा कि क्या कोर्ट इस विषय पर स्थायी दिशा-निर्देश जारी करेगा, जिससे भविष्य में पीड़ितों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना न पड़े।
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