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विशेष: नवरात्रा के (चौथे दिन ) दुर्गा के चौथे स्वरूप कूष्माण्डा की कथा एवम पूजन विधि और आरती

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October 8, 2020

अपनी मन्द हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारंण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है।

कूष्माण्डा

माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। 

अपनी मन्द हंसी से  ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारंण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है। 

मां कूष्‍मांडा की पूजा विधि 
नवरात्रि के चौथे दिन सुबह-सवेरे उठकर स्‍नान कर हरे रंग के वस्‍त्र धारण करें. 
 मां की फोटो या मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएं और उन्‍हें तिलक लगाएं. 
 अब देवी को हरी इलायची, सौंफ और कुम्‍हड़े का भोग लगाएं. 
अब ऊं कूष्‍मांडा देव्‍यै नम: मंत्र का 108 बार जाप करें. 
 मां कूष्‍मांडा की आरती उतारें और क‍िसी ब्राह्मण को भोजन कराएं या दान दें. 
 इसके बाद स्‍वयं भी प्रसाद ग्रहण करें. 
मां कूष्‍मांडा का भोग
मान्‍यता है क‍ि श्रद्धा भाव से मां कूष्‍मांडा को जो भी अर्पित किया जाए उसे वो प्रसन्‍नतापूर्वक स्‍वीकार कर लेती हैं. लेकिन मां कूष्‍मांडा को मालपुए का भोग अतिप्रिय है. 

इस दिन जहाँ तक संभव हो बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिलाना श्रेयस्कर है। इसके बाद फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान भेंट करना चाहिए। जिससे माताजी प्रसन्न होती हैं। और मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।


वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥


 कथा  -संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण से भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। जब सृष्टि नहीं थी और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब इन्होंने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। 

यह सृष्टि की आदिस्वरूपा हैं और आदिशक्ति भी। इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है।

 नवरात्रि के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की पूजा की जाती है। साधक इस दिन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है। अतः इस दिन पवित्र मन से माँ के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजन करना चाहिए।

 माँ कूष्माण्डा देवी की पूजा से भक्त के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। माँ की भक्ति से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य की वृद्धि होती है। इनकी आठ भुजायें हैं इसीलिए इन्हें अष्टभुजा कहा जाता है। इनके सात हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। कूष्माण्डा देवी अल्पसेवा और अल्पभक्ति से ही प्रसन्न हो जाती हैं। यदि साधक सच्चे मन से इनका शरणागत बन जाये तो उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो जाती है।

कूष्मांडा  मां की  आरती 


कूष्मांडा जय जग सुखदानी।

मुझ पर दया करो महारानी॥


पिगंला ज्वालामुखी निराली।

शाकंबरी माँ भोली भाली॥


लाखों नाम निराले तेरे ।

भक्त कई मतवाले तेरे॥


भीमा पर्वत पर है डेरा।

स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥


सबकी सुनती हो जगदंबे।

सुख पहुँचती हो माँ अंबे॥


तेरे दर्शन का मैं प्यासा।

पूर्ण कर दो मेरी आशा॥


माँ के मन में ममता भारी।

क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥


तेरे दर पर किया है डेरा।

दूर करो माँ संकट मेरा॥


मेरे कारज पूरे कर दो।

मेरे तुम भंडारे भर दो॥


तेरा दास तुझे ही ध्याए।

भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥




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