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August 6, 2020
#मधुकर कहिन
बेचारे अभिभावक और बच्चे जाएँ तो जाएँ कहाँ
ऑनलाइन क्लासेज के नाम पर स्कूल माफियाओं का कहर जारी
नरेश राघानी
दुनिया इधर की उधर हो जाए । कोई जीये या मरे । कुछ भी करें ... बस जेबे झाड़े और स्कूल माफिया की जेब भरें ।
कुछ इसी तरह का काम लगभग पूरे देश में चल रहा है। कॅरोना महामारी में एक तरफ लोग अपनी जान बचाने और अपना रोजगार बचाने में लगे हैं। तो दूसरी तरफ स्कूल माफिया अपनी निर्लज्जता की हदें पार कर रहा है। जिस तरफ देखो, जिस घर में देखो, घर के छोटे-छोटे बच्चे मोबाइल और आईपॉड मैं आंखें गड़ाए बैठे हैं । जब स्कूल ही कब खुलेंगे इसी का असमंजस है। ऐसे में कागजों में गालियाँ निकाल निकाल कर स्कूल माफिया का अपनी मनमानी की हदें पार करना आखिर कितना वाजिब है
आए दिन रोज शहर में किसी न किसी स्कूल को लेकर प्रदर्शन होता है। बस केवल प्रदर्शनी होता है । प्रदेश में व्याप्त अदृश्य कांग्रेस सरकार जैसलमेर के सूर्यगढ़ में जाकर अपना डेरा डाले हुए हैं। और प्रदेश भर के अभिभावकों को ऐसी अमानवीय यातनाएं भुगतने के लिए इन स्कूल माफियाओं के आगे बली का बकरा बना कर फेंक रखा है। ऐसे में उन अभिभावकों के पास अपनी पीड़ा जाहिर करने के लिए उन स्कूलों के सामने जाकर खड़े होकर नारेबाजी करने के अलावा कोई भी विकल्प नहीं बच गया है। सरकार ने छोड़ा ही नहीं है !!!
प्रशासन को और मीडिया को भी रोज ऐसी खबरें देखने की और लिखने की आदत पड़ गई है । ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी का हो रहा है, तो हो रहा है उन बच्चों का जो बच्चे क्लास में बैठकर टीचर से शिक्षा ग्रहण करने की बजाय एक मशीन के सामने बैठे 12 घंटे में से 6 घंटे सर खपा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह की पढ़ाई ना तो फलीभूत होती है। उल्टा इन मशीनों के ज्यादा इस्तेमाल से उन बच्चों की आंखों सोचने की क्षमता और दिमाग पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बच्चों को ऑनलाइन क्लासेज के नाम पर शिक्षा की जगह ऐसी गंभीर बीमारियां बांटने वाला स्कूली शिक्षा तंत्र अपनी जेब भरने के लिए इन दोनों निर्लज्ज और निर्मम हदों तक सक्रिय है।
अप्रत्यक्ष रूप से बच्चे का स्कूल लिस्ट से नाम से काट देने की धमकी सा प्रतीत होता हुआ पत्राचार स्कूलों द्वारा किया जाता है। रोज एसएमएस ईमेल के माध्यम से अभिभावकों को ब्लैकमेल किया जा रहा है । सरकार की नज़र अभिभावकों की पीड़ा और बच्चों की स्वास्थ्य पर मंडराते खतरे पर न जाने कब पड़ेगी, लेकिन यदि अभी नहीं पड़ेगी तो फिर आखिर कब पड़ेगी
ऐसे में अभिभावकों के सामने मात्र प्रदर्शन करते रहने के अलावा , एक विकल्प और भी है जिस पर अभिभावक अभी सोच नहीं पा रहे हैं । वह विकल्प है कानूनी लड़ाई का । यदि सारे अभिभावक मिलकर अपने अपने थाना क्षेत्र में और उपभोक्ता संरक्षण मंच के माध्यम से एक एक मुकदमा भी दर्ज करा दें। तो देश के न्यायालय परिसर के भीतर न्याय का इंतज़ार करती लाखों फ़ाइलों की भीड़ में कुछ लाख फाइलें और जुड़ जाएंगी । फिर शायद सरकार की आंखें खुलें और इस चीज का हल निकल आये। वैसे भी आज के लोकतंत्र में हर समस्या का हल केवल न्यायालय ही रह गया है । क्योंकि जब राजस्थान समेत कई सरकारें तक न्यायालय में खड़े होकर अपने आप को सिद्ध करने की भीख मांग रही है। तो ऐसे में अगर भोली भाली जनता अपने मूलभूत सुविधाओं के मुद्दों को लेकर न्यायालय में चली जाए तो इसमें हर्ज ही क्या है। फिर हमारा न्याय तंत्र ही एक ऐसी जगह है जिससे आम आदमी फिर भी थोड़ी उम्मीद कर सकता है और समस्या को घुटने टेकने ही पड़ते हैं । बाकी सब कुछ तो इस लोकतंत्र में मोह माया ही है ...
आज के लिए बस इतना ही ... बाकी किस्सा फिर कभी
जय श्री कृष्ण
प्रधान संपादक
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