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#मधुकर कहिन: .सत्ता की सुरा पीकर सरकार मस्त ... और आम आदमी का हौसला पस्त

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July 6, 2020

निजी बैंक और आर्थिक संस्थाएं बेरहमी से वसूल रही है लॉक डाउन काल का ब्याज

मधुकर कहिन
 सत्ता की सुरा पीकर सरकार मस्त ... और आम आदमी का हौसला पस्त 
 निजी बैंक और आर्थिक संस्थाएं बेरहमी से वसूल रही है लॉक डाउन काल का ब्याज 

✒️ नरेश राघानी 

कोरोना महामारी का असर अब आम आदमी के आर्थिक हालातों पर पड़ता हुआ साफ नजर आ रहा है । करोना को जो करना था उसने कर लिया और भी आगे करने को है। लेकिन हमारी सरकारें आम आदमी का दर्द अब तक समझने को तैयार नहीं है । 
            आज सैकड़ों महिलाओं ने जिला कलेक्टर कार्यालय पर पहुंचकर निजी कोऑपरेटिव सोसायटियों और लोगों को लोन देकर उनका बेरहमी से खून चूसने वालों की शिकायत की। जी हाँ !!! आपने बिल्कुल सही पढ़ा ... मैं खून चूसना ही कह रहा हूँ। और यह इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह आर्थिक सोसाइटी और ब्याज वसूलने वाले लाइसेंस धारी राक्षस लोन सुविधा उपलब्ध कराने वाली छोटी मोटी फाइनैंशल संस्थाओं के माध्यम से इन दिनों अजमेरवासियों से लॉक डाउन काल का ब्याज वसूलने में जुटे है । जाहिर बात है कि लॉकडाउन के दौरान लोग घरों में रहे हैं, अपनी जान बचाने के लिए । ऐसे में सरकार सिर्फ निजी बैंकिंग संस्थाओं को दो लाइन के निर्देश पारित करके अपना पल्ला झाड़ कर बैठ गई है। यह नहीं देखा जा रहा है कि वह बैंक सरकार के निर्देशों का पालन कर भी रहा है या नहीं । केंद्र सरकार ने सभी बैंकों को यह निर्देश दिए थे कि लॉक डाउन काल में किश्तें वसूलने की सख्ती न की जाए। और कुछ समय अवधि में राहत दी जाए। परंतु उस आदेश में यह लाइन नहीं लिखी गई थी कि यह सब अनिवार्य रूप से बैंकों को करना है।
        बैंक बेरहम होता है, बैंक के पास दिल नहीं होता। मेरे एक 60 वर्षीय बुद्धिजीवी मित्र ने कुछ दिन पहले मुझसे कहा था कि - मधुकर जी इस दुनिया में अगर सबसे घटिया,प्रैक्टिकल और अमानवीय संस्था है तो वह संस्था बैंक है । इंसान 24 घंटे में से केवल 12 घंटे अपना काम करता है। कुछ लोग 18 घंटे काम करते हैं। लेकिन बैंक 24 घंटे का ब्याज वसूलता है । आम दिनों में तो शायद यह चल भी जाए। लेकिन ऐसे महामारी के काल में जब बैंक के उपभोक्ता के पास काम नहीं होता , आय नहीं होती , लेकिन फिर भी ब्याज भरने की अनिवार्यता सर पर नंगा नाच कर रही होती है। सरकार ने दो लाइन के निर्देश देकर अपनी वाहवाही लूट कर जनता के सामने भगवान बन गयी। लेकिन इस समस्या का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया। 
        जब राजा खुद व्यापारी बन जाये और दिल की बजाए जेब से सोचने लगे तो उस राज्य का सर्वनाश तय होता है। उस बुज़ुर्ग मित्र की यह बात सुन कर दिमाग में छेद हो गया, रात भर सो नहीं पाया। 

      आज सुबह फिर मेरे पास एक फोन आया। जिसमें एक दूसरे प्रदेश में रह रही महिला ने अपने बुजुर्ग मां-बाप की पीड़ा मुझे बताई। उन्होंने यह कहा कि उनके बुजुर्ग मां-बाप अजमेर  में रहते हैं। और पिता अस्वस्थ हैं। उनके पिता ने एक निजी कोऑपरेटिव सोसाइटी के पास तकरीबन आठ लाख जमा करवाए थे। वह सोसायटी अब उन्हें वह धन वापस नहीं दे रही है। सोसाइटी और उसके कारिंदे अब फोन नहीं उठाते । गौरतलब है कि इस सोसाइटी के खिलाफ सैकड़ों लोग ज़िला कलेक्टर के पास ज्ञापन लेकर 2016 में जा चुके हैं। वह ज्ञापन भी अब तक शायद कलेक्टर कार्यालय में कहीं किसी रद्दी के ढेर में पड़ा रद्दी के भाव बिक गया होगा। उस बुजुर्ग दंपत्ति ने उस समय हिम्मत नहीं जुटाई कि उस निर्लज्ज सोसायटी संचालक के खिलाफ कोई मजबूत कानूनी कार्रवाई करें । जिसका कारण उनकी उम्र थी।  वह किसी झंझट में नहीं पड़ना चाहते थे। शायद उन्हें भी इस नकारा सिस्टम की यिज्ञता पर विश्वास नहीं बचा है। हम अक्सर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें हमारे देश के नेताओं के मूँह से सुनते हैं। लेकिन यथार्थ के धरातल पर ऐसी बड़ी बड़ी बातें करने वाले हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों का मूँह काला है । कभी-कभी तो लगता है कि इन नेताओं के मुंह से जितनी बातें निकलती हैं। यदि उतने चावल और गेहूं के दाने निकलते तो शायद देश की पूरी भूखमरी मिट जाती। 
          खैर !!! इस भ्रष्ट तंत्र में राजनीतिक लोगों से उम्मीद करना तो बेमानी है । लेकिन कम से कम सरकार के लिए काम करने वाले अधिकारी वर्ग का कुछ तो उत्तर दायित्व बनता ही है, कि वह ऐसे निजी आर्थिक संस्थानों पर सख्त कार्यवाही करें। ताकि लोगों का विश्वास लोकतंत्र में बना रहे । 
            यदि जिला कलेक्टर या एडीएम सिटी इस पर कोई कार्यवाही नहीं करेंगे तो भी चल जाएगा। क्या हो जाएगा ?? ज्यादा से ज्यादा वह बुजुर्ग दंपत्ति और वह सैकड़ों महिलाएं और उनके बच्चे दाने-दाने को मोहताज हो जाएंगे। इन अधिकारियों के खाते में तो तनख्वा सरकार डाल ही रही है। उनकी अपनी समस्याएं तो हल हो ही रही है। परंतु ऐसे में कहीं ना कहीं इन जिम्मेदार लोगों को इन पीड़ित लोगों की पुकार और अपनी नाराज अंतरात्मा का सामना रोज सुबह खड़े होकर आईने में करना ही पड़ेगा। जो कि उनका गिरेबान पकड़कर कहेंगे कि जब लोग इतनी तकलीफ में तड़प रहे थे, और आपके पास आए भी थे । तब आप क्या कर रहे थे ??? 
             खैर !!! इस ब्लॉग के साथ में उस निर्लज्ज सोसायटी संचालक का फोन नंबर डाल रहा हूँ। जिस किसी की अंतरात्मा जागे ... वह इस नंबर पर कॉल कर के उस से जरूर पूछें कि - 
  
भाई !!! इंसान हो या राक्षस 
   


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