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February 7, 2020
सोशल मीडिया पर सोशल बनकर ही लिखा जाना चाहिए*
*राजेश टंडन की शब्दावली बिल्कुल स्वीकार्य नहीं ..*
️ *नरेश राघानी*
शहर के मशहूर वकील और हाल ही में ब्लॉगर बने एडवोकेट राजेश टंडन अजमेर की *हस्तियों* में गिने जाते हैं। यही कारण है कि जब भी राजेश टंडन ने आज तक कुछ लिखा है । वह कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप में रंग लाया है। राजेश टंडन के हर लेख पर लगभग त्वरित कार्यवाही अंजाम दी गई है। यह बात यह समझने के लिए काफी है कि राजेश टंडन की अजमेर में क्या साख है। और यह बात टंडन साहब को भी गंभीरता से समझनी चाहिए । *जिसे समझने में इस बार राजेश टंडन से चूक हो गई है । और चूक भी ऐसी जिसका कोई इलाज अब तक तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा है।*
टंडन साहब को यह समझना चाहिए था कि जब शहर का संभ्रांत वर्ग उनकी लिखी बात को इतनी गंभीरता से लेता है तो वह जो *कुछ भी* कैसे लिख सकते हैं ? *फिर जब आप सोशल मीडिया पर ही लिख रहे हैं, तो आपको थोड़ा बहुतप सोशल तरीका अपनाना ही पड़ेगा ।* क्योंकि सोशल मीडिया पर लिखी गई बात केवल उस आदमी तक ही नहीं पहुंचती जिसके बारे में लिखी गई है। वह बात उसके पूरे परिवार , मित्रों,शत्रुओं तक ही नहीं , अपितु आपके अपने परिवार और पूरे शहर तक भी पहुंचती है। ऐसे अनजान लोगों तक भी पहुंचती है जो गाहे-बगाहे उस सोशल मीडिया पृष्ठ को देखते है। यह तो है एक बात।
दूसरी बात यह है कि हमारी *भारतीय संस्कृति में नारी का एक बहुत ही सशक्त और सम्मानजनक स्थान है । और वह स्थान बना रहना चाहिए।* जब आप किसी भी महिला के बारे में कुछ लिखते हैं तो उसकी पुष्टि करना बहुत आवश्यक है। और मैं तो कहूंगा पुष्टि हो जाने पर भी यदि इस तरह की बातों को सार्वजनिक तौर से लिखा या कहा जाए तो उसकी भी एक गरिमा है। इस गरिमा का पालन बहुत अनिवार्य है । मैं ऐसा नहीं कहता कि टंडन साहब ने ब्लॉग लिखने में मर्यादा का पालन नहीं किया होगा। आखिर वो एक काबिल वकील है। परंतु फिर भी उसमें कुछ लाइनें और शब्द जैसे *कामुक और अप्राकृतिक रतिक्रिया नहीं लिखे जाने चाहिए थे।* क्योंकि आप एक महिला के बारे में लिख रहे थे।
आपने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहा कि - आपने क्योंकि आप कानून के ज्ञाता हैं इसलिए ब्लॉग के माध्यम से
लोगों से अपील की है की इस तरह का वीडियो अपने मोबाइल में रखना ठीक नहीं है। इसलिए उसे ना देखें और मिटा दें। जबकि इस लाइन के ठीक ऊपर आपने यह भी लिखा है कि - *उक्त महिला अधिकारी से व्यवहार रखने से पहले उनके साथ अधिकारी और आसपास के लोग वह वीडियो जरूर देखें । क्योंकि* *बचाव ही श्रेष्ठ उपचार है ।*
यह विरोधाभास समझ में नहीं आया। पत्रकारिता में भाषाई हदों की यह पराकाष्ठा बिल्कुल स्वीकार नहीं है, और न ही होनी चाहिए । शायद यही *कुशब्द* ऐसे हैं। जिनके पीछे आपका वकील समुदाय भी आपके साथ मजबूती से खड़ा होने में झिझक महसूस कर रहा है। हालांकि पूरी उम्र वकालत को देने के बाद, मुझे यकीन है कि कहीं ना कहीं वकील तो लिहाज़ वाश आपके साथ आकर खड़े हो ही जाएंगे। परंतु कहीं न कहीं उनके मन में भी यह बात रह जाएगी कि - *यार किस बात के लिए आकर खड़े हुए है ???*
खैर मुझे मेरे इष्ट मित्रों साथी सहयोगियों ने कहा था कि - *मधुकर जी !!! आप इस बात पर मत लिखना। न किसी के पक्ष में लिखना न विपक्ष में। तो उन सभी मित्रों से करबद्ध क्षमा .... दो पंक्तियों में अपनी मनोस्थिति कह देता हूँ।*
*तुम्हारे कहने पर मैं मेरी आंखें तो बंद कर लूं यारों*
*कमबख्त इस इमां का क्या करूं कोई बताए मुझको*
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