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January 10, 2020
*#मधुकर कहिन* 2212
*जब अक्षय कुमार प्रधानमंत्री के साथ बैठकर आम खाने की विधा पर इंटरव्यू कर सकते हैं ???*
*तो दीपिका पादुकोण क्यों नहीं जा सकती छात्रों के बीच ???*
✒️ *नरेश राघानी*
कुछ दिन पहले मैंने आपको *साधु संतों के भेष में छुपे कुछ अघोषित राजनेताओं* के विषय में ब्लॉग लिखकर बताया था। आज मैं आपको कुछ ऐसे फिल्मी सितारों के बारे में बताऊंगा जो की *गोदी मीडिया की तरह गोदी सितारे जैसा व्यवहार करते हैं।* दीपिका पादुकोण का जेएनयू में जाकर खड़े हो जाना इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। दीपिका के इस कदम से व्यथित होकर *राजनैतिक मेंढक दरिया से बाहर निकल कर छपाक छपाक करने लगे हैं।* और दीपिका की आने वाली नई फिल्म *छपाक का बायकाट* करते नज़र आ रहे हैं।
भारतीय फ़िल्म जगत और राजनीति का रिश्ता वक़्त के साथ बड़े बदलावों से गुज़रा हैं। इस सफर की व्यापक शुरुआत शायद देश की *प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के* से हुई थी । जब स्व. इंदिरा गांधी ने उस जमाने के सभी सुपरस्टार जैसे *दिलीप कुमार ,राज कपूर ,देवानंद आदि के साथ खड़े होकर एक ग्रुप फोटो खिंचवाई। उस फोटो ने एक सिलसिले की शुरुआत की जिसने फिल्मी सितारों और राजनीति को आपस में एक दूसरे का अघोषित रूप से पूरक घोषित कर दिया।* तब राजनेताओं का फिल्मी दुनिया में सिर्फ इतना ही हस्तक्षेप होता था कि किसी राजनेता को जब भी अपनी *छवि सुधारने हेतु ज़रूरत पड़ती* तो वह फिल्मी सितारों के करिश्मे को अपने साथ जोड़ लेता था। और नेताओं द्वारा फिल्मी सितारों के साथ इस तरह की मेलजोल को लोगों के बीच में प्रदर्शित किया जाता था। *परंतु पिछले 10 सालों में जब से नरेंद्र मोदी की सरकार ताकत में आई है , फिल्मी चमक सिर्फ मेलजोल प्रदर्शित करने तक नहीं बल्कि एक हथियार के रूप में इस्तेमाल की गई है। जिससे फिल्मी सितारे समाज से जुड़े राजनीतिक मुद्दों पर भी अपनी राय प्रदर्शित करने की हदें पार कर रहे हैं।* जिस तरह से इस *देश में गोदी मीडिया है उसी तरह से गोदी फिल्म जगत की हस्तियां भी है । जिन्हें विशेष तौर से अनुपम खेर, अक्षय कुमार, परेश रावल, विवेक ओबेरॉय जैसे चेहरे शामिल है। जो पार्टी बन कर केंद्र सरकार की योजनाओं का न सिर्फ अघोषित प्रचार करते हैं, बल्कि भाजपा के विरोध में उठ रही हर आवाज को अपनी स्टारडम से दबाने का प्रयास भी करते हैं ।* ऐसे माहौल में दीपिका पादुकोण यदि जाकर जेएनयू के छात्रों के साथ उनके आंदोलन में खड़ी हो गई, तो *कौन सी बड़ी बात हो गई ???* कुछ लोग कह रहे हैं कि - *दीपिका ने यह खेल अपनी आने वाली पिक्चर छपाक को हिट कराने हेतु खेला है।* पहली बात तो ऐसा कुछ नजर नहीं आता ... परंतु चलो फिर भी अगर यह मान लिया जाए कि ऐसा हुआ है । तो *वही लोग विवेक ओबेरॉय की नरेंद्र मोदी कट प्रचार और प्रधानमंत्री से अक्षय कुमार की आम खाने की विभिन्न पद्दतियों पर चर्चा को क्या कहेंगे ?* मेरा यह मानना है कि हर इंसान की अपनी अपनी पसंद होती है और नज़रिया होता है कि वह किस तरह के लोगों के बीच खड़ा होना पसंद करता है। और ये *निजी आज़ादी है।* *दीपिका चाहती तो वह भी अक्षय कुमार और अन्य गोदी फ़िल्म सितारों की तरह प्रधानमंत्री के पीछे खड़ी होकर भी अपनी फिल्म हिट करवा सकती थी। लेकिन दीपिका ने अपनी पिक्चर हिट करवाने के लिए ही सही फिर भी कन्हैया कुमार और जेएनयू के पीड़ित छात्रों को चुना। इसमें इतना बवांल किस बात का ?? दीपिका को गोदी सितारा नहीं बनना था तो नहीं बनना था !!! वह नहीं बनी ...*
*बात छपाक के विरोध की ...* तो साहब !!!! छपाक एक ऐसे मुद्दे पर बनाई गई फ़िल्म है *जिसका संबंध नारी जाति की सुरक्षा और हौसले से है। और यह विषय ही ऐसा है कि इस पर बनाई गई फ़िल्म तो वैसे भी चलेगी।* लेकिन ऐसे सामाजिक विषय पर बनी *फ़िल्म का विरोध केवल इसलिए करना कि दीपिका जाकर एक ऐसी लड़की के साथ खड़ी हो गयी जो कि छात्र संघ की अध्यक्ष है । और अपने लोगों के हित की लड़ाई में लड़ते लड़ते गुंडों के हाथ से पिट गयी है ... बिल्कुल बेवजिब है ।*
*वैसे तो मैंने भी कई दिनों से कोई फ़िल्म नहीं देखी है लेकिन अब लगता है कि यह फ़िल्म इसलिए सपरिवार जाकर देखनी पड़ेगी की इसका संबंध सही और गलत की लड़ाई से बन गया है। और गलत को गलत तो भाई कहना ही पड़ेगा ताकि सच कायम रह सके।*
जय श्री कृष्ण
नरेश राघानी
*Horizon Hind | हिन्दी न्यूज़*
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