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#मधुकर कहिन: रही होगी उनकी भी कोई मजबूरी ग़ालिब

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January 3, 2020

#मधुकर कहिन 2202
रही होगी उनकी भी कोई मजबूरी ग़ालिब
यूँ ही कोई बेहया नहीं होता

नरेश राघानी

सुबह बहुत ठंड थी। तो ऑफिस जरा देर से आया । मीठी सी धूप निकली हुई थी और मेरा सहयोगी यश अभी तक भी आया नहीं था । मैं इंतजार करने के लिए ऑफिस के सामने एक *जनरल स्टोर* है । वहां खड़ा होकर धूप सेकने लगा । देखा तो पड़ोस में *रेलवे से रिटायर्ड कृष्ण गोपाल चतुर्वेदी* एक गली के आवारा कुत्ते को पकड़ कर उसकी आंखों में आई ड्रॉप डाल रहे थे। यह दृश्य देखकर मैंने कहा *अंकल थोड़ा संभल के कहीं काट न ले।* तो अंकल बोले - *इनके काटे का इलाज तो 14 इंजेक्शन है बेटा और यह बेवजह किसी को नहीं काटते । कभी कभी अनजाने में ही सही इंसान ही एक ऐसा जानवर है जो बेवजह काटता है । वह भी ऐसा की जिसका कोई इलाज नहीं होता।*
मां कसम अंकल की यह लाइन *खोपड़ी में घर कर गई* । मैन पूछा *बेवजह कैसे अंकल ?*
उन्होंने अपने जीवन का एक ऐसा अनुभव मेरे साथ शेयर किया जो मैं इस ब्लॉग के माध्यम से आपको बताना चाहता हूं। कृष्ण गोपाल चतुर्वेदी रेलवे से रिटायर्ड है । उन्होंने बताया कि सन् 1980 और 84 के बीच में उन्हें रेलवे बोर्ड ने उन्हें *रेलवे विजिलेंस अफसर* के पद पर 4 साल तक काम किया है । 1 दिन एक वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें बुलाया और कहा कि *इस गाड़ी का रेलवे टीटी है । जो बहुत गहरी हदों तक भ्रष्टाचार कर रहा है। और पूरी की पूरी बोगी की सीटें बेच देता है। जिस उसे काली कमाई होती है ।* सीधे-साधे आदेश हुए कि *इस टीटी को ट्रैप करना है, और मजबूत केस बनाना है । ताकि उसे पद से हटाया जा सके ।* जिस पर कृष्ण गोपाल चतुर्वेदी ने बाकायदा योजना बनाई और उस भ्रष्ट टीटी की पड़ताल की । पड़ताल में यह ज्ञात हुआ कि वह वाकई पूरी की पूरी बोगी ऊपर ही ऊपर बेच देता है। जिसकी एक भी रसीद नहीं काटता है। चतुर्वेदी ने योजनाबद्ध तरीके से इस विषय में ज्ञात सभी चीजें मय सबूतों के अपने सीनियर अधिकारी को डॉक्यूमेंटेशन करके भेज दी। थोड़े दिनों बाद जब उस अधिकारी को रंगे हाथों पकड़ा जाने वाला था। तब कृष्ण गोपाल चतुर्वेदी को यह ज्ञात हुआ कि उस टीटी के *5 बेटियां थी । जोकि शादी की उम्र के करीब थी । और उसकी बीवी अक्सर बीमार रहती थी। कोई बेटा ना होने के कारण उस टीटी पर परिवार की जबरदस्त जिम्मेदारी सर पर बनी हुई थी। इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए वह यह भ्रष्टाचार कर रहा था ।* जैसे ही चतुर्वेदी को यह पता पड़ा तो उन्हें यह लगने लगा कि कहीं उनका बनाया हुआ यह केस इस पांच बेटियों की जिम्मेदारी के तले दबे परिवार को सड़क पर न ले आये। चतुर्वेदी तुरंत अपने सीनियर अधिकारी के पास गया और कहा - *सर आपने मुझे जो कहा उस आदेश की पालना मैंने कर दी। कानूनी और व्यवहारिक रूप से मैंने अपना फर्ज बखूबी निभा लिया। परंतु जब से मुझे उस टीटी की परिवारिक स्थिति का पता चला है , मुझे कहीं ना कहीं अंदर अपराध बोध खा रहा है की कही मेरे हाथों से कोई अनर्थ तो नहीं हो जाएगा ?* आप अगर वाकई उस व्यक्ति को इस भ्रष्ट आचरण की सजा देना चाहते हैं। तो उसे रेलवे प्लेटफार्म पर कोई ऐसी जिम्मेदारी दे दें ताकि उसे आर्थिक लेनदेन से दूर रखा जाए। और उसकी नौकरी ना जाए । इससे रेलवे को भी नुकसान नहीं होगा और अपनी परिवारिक मजबूरियों के चलते ऐसा भ्रष्ट आचरण करने वाले अधिकारी को सबक भी मिलेगा। उन पांच बेटियों को भी नुकसान नहीं होगा । *मोटे तौर पर विजिलेंस का अधिकारी होते हुए भी चतुर्वेदी ने एक तरह से अघोषित रूप से अपने सीनियर अधिकारी से उस भ्रष्ट टीटी को नौकरी से न हटाने की सिफारिश कर डाली थी।* जिसके बाद चतुर्वेदी जी के निजी आग्रह पर उस टीटी को नौकरी से नहीं हटाया गया । और वही किया गया जो चतुर्वेदी ने कहा। आगे अपनी बात कहते हुए चतुर्वेदी जी ने कहा कि उसके बाद भी मेरे कार्यकाल को विजिलेंस में 1 साल बाकी रह गया था । इस घटना से वह इतना आहत हुए कि उन्हें यह लगने लगा था कि *उन्होंने इससे पहले जितने भी अधिकारियों को इस तरह से पकड़ा होगा कहीं उनके भी परिवारों में ऐसी मजबूरियां ना रही हों ?* यह सोचकर वह एक दिन अपने वरिष्ठ अधिकारी के पास गए और कहा कि - *साहब मुझे विजिलेंस से हटा दीजिए ... मुझे ये काम नहीं करना। मुझसे अब यह नहीं होगा।* वरिष्ठ अधिकारियों के लाख समझाने पर भी *चतुर्वेदी जी ने विजिलेंस की पोस्ट 1 साल पहले छोड़ दी।* और आज चतुर्वेदी की उम्र 70 साल प्लस है। वह खुद रिटायर हैं। और पंचशील नगर हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के बी ब्लॉक में बड़ी शांति की जिंदगी जी रहे हैं।

*इस किस्से ने सोचने पर मजबूर कर दिया* कि चतुर्वेदी जी ने सही किया या गलत ? उनके नजरिए से तो शायद यह बिल्कुल सही था। फिर पूरे किस्से में गलत कौन था ? क्या वह अधिकारी जो अपनी पांच बेटियों की शादी के लिए भ्रष्टाचार कर रहा था ? या फिर ये समाज ? जो इस तरह से एक बाप को भ्रष्ट आचरण करने पर मजबूर करता है। वो भी केवल महंगी शादी करने के लिए।
*आये दिन मैं खुद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अधिकारियों की खबरें लिखता हूँ ... और पढ़ता भी हूँ । लेकिन ये किस्सा सुनने के बाद कुछ देर के लिए क़लम थम सी गयी है ।*
*यह किस्सा सुनकर सचमुच दिमाग का दही हो गया है।* बस मिर्ज़ा ग़ालिब की लिखी बड़ी सटीक पंक्तियां याद आ रहीं हैं जिनमें कभी कहा गया था -

*रही होगी उनकी भी कोई मजबूरी ग़ालिब*
*फिर यूं ही कोई बेहया नहीं होता ...*

जय श्री कृष्ण

नरेश राघानी
प्रधान संपादक
Horizon Hind | हिन्दी न्यूज़
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