Post Views 1041
January 3, 2020
#मधुकर कहिन 2204
भूखा पेट हाथ में रुमाल
सरकारी स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का ही टोटा .... और राज्य सरकार भेज रही है स्मार्ट क्लास सजाने हेतु कम्प्यूटर
नरेश राघानी
सरकारी चाहे कितना भी काम कर ले लेकिन नीचे का प्रशासनिक ढांचा कैसे *सरकार के फैसलों की बारह बजाता है ?* यह किसी को देखना हो तो जाकर अजमेर की *सरकारी स्कूलों* में देख सकता है। लाखों करोड़ों रुपया शिक्षा विभाग द्वारा खर्च करके इन सरकारी स्कूलों को हर तरह की सुविधा सरकार मुहैया करा रही है। परंतु हमारे यहां का प्रशासनिक ढांचा इतना लचर और कमजोर है की सरकार की भावना के अनुरूप काम होता हुआ नजर नहीं आता है। वह ढांचा सरकार को यह नहीं बता पाता कि आखिर ज़मीन पर लोगों की ज़रूरत क्या है ? आप सोच रहे होंगे कि आज मैं यह क्या लेकर बैठ गया ?
तो सुनिए आज सुबह मेरा मोबाइल बजा मैंने फोन उठाया तो उस तरफ सामाजिक सरोकार से जुड़ी फ्लाइंग बर्ड संस्थान की अध्यक्ष अंबिका हेडा थीं। जिन से बात करने पर यह पता चला कि , फ्लाइंग बर्ड्स संस्थान की टीम सेवा कार्य हेतु आये दिन शहर भर की सरकारी स्कूलों में जा रही है। जिसमें उनका मूल उद्देश्य अभाव ग्रस्त सरकारी स्कूलों में सेवा सहयोग करना है।
अजमेर के सरकारी स्कूलों में आजकल राज्य सरकार द्वारा कंप्यूटर शिक्षा प्रदान करने हेतु स्मार्ट क्लासेज विकसित करने के उद्देश्य से कंप्यूटर भेजे जा रहे हैं।* जो कि अधिकांश स्कूलों में कभी *अलमारियों के ऊपर या गोदामों में पड़े सड़ रहे हैं। अभी तक किसी भी स्कूल के पास इन कंप्यूटरों को सही रूप से इंस्टॉल कर, विद्यार्थियों हेतु नियमित कक्षाएं संचालित करने की व्यवस्था नहीं है। ऐसी ही एक स्कूल में फ्लाइंग बर्ड संस्थान की टीम पहुंची। जहां पर उन्हें यह सब ज्ञात हुआ। अंबिका हेडा इस बात को लेकर भी चिंतित थी की *आखिर सरकार जब इतना सब कुछ ऊपर से भेज रही है, तो वह सब बच्चों के काम क्यूँ नहीं आ रहा है ?* सरकारी स्कूलों में वैसे तो *स्मार्ट क्लास के नाम पर कमरे बना दिए गए हैं । लेकिन अभी तक पूरी तरह से स्मार्ट क्लासेस संचालित नहीं है। नाका मदार की सरकारी स्कूल की तरह *कई सरकारी स्कूलों में तो बच्चों के बैठने के लिए दरिया तक नहीं है । ना ही लाइटें लगी है। बच्चों और अध्यापकों के बैठने के लिए कुर्सियाँ भी नहीं है। अधिकांश स्कूलों में तो पीने के पानी के टैंकर तक की व्यवस्था नहीं है।* सुनकर बहुत अजीब लगा। *अपुन के तो यह समझ में नहीं आया कि जब मूलभूत सुविधाओं का ही इतना भारी टोटा है, तो सरकार किन स्मार्ट क्लासेस की बात कर रही है ? अब यह तो वही हुआ कि किसी भूखे नंगे को रोटी देने से पहले आप हाथ में *लाल रुमाल* देकर कह दिया कि - *बेटा यह लाल रुमाल रख रख ले !!! तुझ पर बहुत अच्छा लगेगा। अरे भाई !!! उस बेचारे को भूख लगी है। उसके पेट में रोटी नहीं है, तन पर कपड़े नहीं है और आप उसे स्मार्ट क्लासेज के नाम पर कंप्यूटर रूपी लाल रुमाल भेंट कर रहे हो। वह उसका करेगा क्या ?* वह लाल रुमाल कुछ दिनों तक तो वहां पड़े पड़े सड़ता रहेगा और फिर वहां से कहीं और चला जाएगा। कहाँ जाएगा उसका अंदाजा लगाने बैठ जाओ तो *दिमाग का दही* हो जाएगा। ऐसे में इस भ्रष्ट देश में यदि कोई *जरूरत से ज्यादा समझदार प्रधानाध्यापक होगा तो वह स्कूल में चोरी की रिपोर्ट लिखयेगा और सारे कंप्यूटर अपने घर ले जाएगा। फिर वह कंप्यूटर उसके बेटे के कमरे की शोभा बढ़ाएगा या फिर उसके जवाई के घर की
मुझे तो लगता है कि *नेताओं के बीच मची सेवा की होड़ केवल उद्घाटन तक ही सीमित रहती है। उसके बाद उन सेवाओं का संचालन हो रहा है या नहीं हो पा रहा है ? इसका इस देश में किसी से कोई लेना देना नहीं है। *राज्य सरकार अगर वाकई इतना खर्चा कर उसका पूरा लाभ आम लोगों तक पहुंचाना चाहती है ? तो राज्य सरकार को ऐसी ईमानदार लोगों की कमेटियां बनानी पड़ेगी, जो कि सरकार द्वारा भेजे गए लाभ को सही मायने में लोगों तक पहुचने के फीडबैक रूपी रिपोर्ट सरकार को प्रेषित करें। जो कि अपनी टिप्पणी सरकार को प्रेषित करे कि वाकई काम ढंग से हो रहे हैं या नहीं ?* दूसरे शब्दों में शिक्षा विभाग को *10-15 गैर राजनीतिक समाज सेवकों की ऐसी समितियां बना देनी चाहिए । जो कि हर सरकारी स्कूल में औचक निरीक्षण कर और जाकर देखें कि जो सामान सरकार से आ रहा है , वह पूरी तरह से बच्चों के काम में आ भी रहा है या नहीं।* तब जाकर सरकार की मूल भावना की पूर्ति होगी। *या फिर ज़िला कलेक्टर खुद निरीक्षण करे और सख्त कार्यवाही करें।* यह तो है सही रास्ता। *बाकी किए जाओ जो करना है साहब !!!! कौन पूछता है ? सब मोह माया है
*जय श्री कृष्ण*
नरेश राघानी
प्रधान संपादक
Horizon Hind | हिन्दी न्यूज़
www.horizonhind.com
9829070307
© Copyright Horizonhind 2025. All rights reserved