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क़लमकार: धर्म परिवर्तन - त्रिभवन कौल

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March 6, 2018

गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली वह बस्ती अल्पसंख्यों की थी। स्थानीय विधायक गुलाम रसूल ने जान बूझ कर मुल्ला मौलवियों के साथ मिल कर आबादी के जीवन स्तर के उत्थान करने की कोशिश कभी नहीं की क्यूंकि उसको पता था यदि ज्ञान का प्रकाश इस आबादी पर पड़ गया तो वोट बैंक तो गया ही गया, उसका रुआब का ताम जाम भी जाएगा । उसकी नज़र हमेशा दुसरे मजहबों के बाशिंदों को अपने मजहब में परिवर्तित कराने की होती जिसके लिए उसको सरहद पार से काफी पैसा भी मिलता था। मकसद एक था , जितना ज्यादा अज्ञान ,अनपढ़ , ज़ाहिल , नादान वोट बैंक होगा उतने ही उसके समुदाय के विधायक विधान सभा में होंगे और एक दिन ऐसा आएगा जब विधान सभाओं में उनका बहुमत हो जाएगा। विधानसभाओं पर कब्ज़ा यानी कि हिंदुस्तान पर कब्ज़ा। मौलाना करीमबक्श भी इसी चाल का एक मोहरा था।
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सुबह के अंधेरे उजाले में मौलाना करीमबक्श मस्जिद की चारदीवारी से बाहर निकला और लम्बे लम्बे डग भर कर गांव के ओर जाने वाली पगडंडी को नापता हुआ गांव के पश्चिमी छोर पर जा पहुंचा जहाँ से हिन्दुओं की बस्ती आरम्भ हो जाती थी । उसके मन उल्लास से ओत प्रोत था। एक हिन्दू का धर्म परिवर्तन कराने के लिए उसे १० हज़ार रूपये मिलने वाले थे दूर बैठे सरहद पार उसके आकाओं से स्थानीय विधायक द्वारा I

पगडंडी समाप्त हो चुकी थी। मंदिर सामने था जो हिन्दुओं की बस्ती का एक सूचक था। मौलाना करीमबक्श की बांछे खिल गयी। उसने मंदिर के बाहर बैठे एक मैले कुचले वस्त्र पहने एक अधेड़ व्यक्ति को देखा। आस पास किसी को भी ना पा कर मौलाना नाक भौं सिकोड़ता उस व्यक्ति के पास पहुंचा। किसी को अपने पास पा कर उस अधेड़ के हाथ, मांगने के अंदाज़ में फैल गए।
“क्यों बे हिन्दू हो क्या ?” मौलाना ने पूछा। अधेड़ ने अपना चेहरा आकाश की ओर कर दिया।
“धर्म परिवर्तन कर। मुसलमान बन जा। सब कुछ प्राप्त होगा। रोटी , कपडा , मकान , पैसा , ऐशो आराम , चार -चार बीबीयाँ ” मौलाना ने उसके कान में कहा।
अधेड़ उसको अपने बहुत करीब पा कर सुकुड़ गया। मौलाना बोलता गया।
“क्या दिया है तुम्हारे धर्म ने तुमको। तुम्हारे देवी -देवताओं ने। गरीबी , लाचारी , भुखमरी।”
अधेड़ की ओर से कोई उत्तर ना पा कर वह झुंझला गया।
अधेड़ ने कुछ नहीं कहा। फटी आँखों से वह उसको देखता रहा और अपने हाथ फिर मौलाना के सामने फैला दिए। तभी गाँव का चौधरी रामधन उनकी ओर आता दिखाई दिया।
“अरे, मौलाना ! सुबह सुबह ! यहाँ पर। “चौधरी ने पूछा।
“सलाम, चौधरी। इधर से निकल रहा था। इस गरीब को देखा तो सोचा इसके लिए अल्लाह से दुआ कर लूँ।
‘यह! यह तो नूरबख्श है। तुम्हारी ही बिरादरी का है। गूंगा -बहरा है। रहने, खाने को लाले पड़े थे सो मैंने मंदिर के बाहर जगह दे दी। खाना भंडारे से खाता है। जब तक इसके सगे सम्बन्धी का अता-पता नहीं मिल जाता तब तक तुम इसको अपनी मस्जिद में पनाह दे दो। नमाज़िओं की सेवा भी करेगा और इसको भी दो वक़्त का खाना मिल जाएगा।” चौधरी ने मौलाना से कहा।
पर मौलवी सुन कर भी कुछ नहीं सुन रहा था। उसने उस अधेड़ का हाथ झटक दिया। ‘ तौबा तौबा। खुदा की मार तुझ पर। मेरा वक़्त ज़ाया कर दिया। पहले मालूम होता तो ………” अपनी बात पूरी किये बिना ही मौलाना करीमबक्श अपनी बस्ती की ओर निकल पड़ा। चौधरी रामधन की समझ में कुछ नहीं आया। उसने उस अधेड़ नूरबख्श को उठाया और अपनी बस्ती की और ले चला।
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सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल


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