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July 25, 2017
उदयपुर.वल्लभनगर तहसील में बालाथल एवं राजसमंद में गिलूंड में उत्खनन में मिली बस्तियां भी आहड़कालीन हैं, जहां उत्खनन कार्य 1993-94 में नवीन तकनीकों से हुआ है। आहड़ के समकक्ष होने के बावजूद इनकी प्राचीनता 4500 साल पुरानी आंकी गई है। पुरातत्वविदों का मानना है कि उदयपुर में आहड़ के टीलों का नवीन विधियों से पुन: उत्खनन होना चाहिए क्योंकि आहड़ सभ्यता 5 हजार साल तक पुरानी हो सकती है। राजस्थान के उदयपुर, भीलवाड़ा, टोंक, राजसमंद, डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि जिलों में 119 आहड़ कालीन स्थान चिह्नित किए गए हैं। इनमें से अधिकतर की प्राचीनता आहड़ से अधिक आंकी गई है। गिलूंड में उत्खनन के दौरान प्राचीनता का आकलन एएमएस विधि से किया गया जो अत्याधुनिक है। गिलूंड की प्राचीनता करीब 4500 साल मानी गई है।
यह हैं आज की तिथि निर्धारण की कुशल तकनीकें
वर्तमान में एएमएस, लुमिनिशी मैथड़ (उष्मादीति तकनीक),पोटेशियम ऑर्गन मैथेड, रेडियो एक्टिव मैथड आदि विधियों से प्राचीनता तय की जाती है। ये विधियां अधिक वैज्ञानिक और सटीक मानी जाती हैं। 70 के दशक के बाद समय गणना के विधियों में बड़े बदलाव हुए हैं। प्राचीनता तय करने की अधिक कुशल तकनीक चलन में आई हैं।
चार हजार साल पुरानी
आहड़ में काफी सीमित क्षेत्र में बहुत पहले उत्खनन कार्य हुआ। विस्तृत क्षेत्र में फिर से उत्खनन करवाने की आवश्यकता है। यह सभ्यता 4 हजार साल से कई अधिक पुरानी हो सकती है।
डॉ. ललित पांडे. इतिहास और पुरातत्वविद्।
सभ्यता आज भी मानी जाती है
कार्बन डेटिंग भी वैज्ञानिक विधि है। एएमएस आदि आज की तकनीकें ज्यादा प्रभावी हैं। आधुनिक तकनीकों से उत्खनन भी होना चाहिए है। इसकी पूरी संभावना है कि आहड़ सभ्यता की प्राचीनता आज जितनी मानी जा रही है, उसे अधिक हो।
डॉ. विनीत गोधल, अधीक्षक संग्रहालय।
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