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October 2, 2026
जयपुर। पूर्व पर्यटन मंत्री विश्वेन्द्र सिंह ने कांग्रेस छोड़ने की घोषणा कर दी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के खिलाफ चार दिन से चल रही बयानबाजी के बीच उन्होंने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर यह ऐलान किया। पोस्ट पार्टी अध्यक्ष को संबोधित करते हुए लिखी गई है और इसमें उन्होंने एक बार फिर प्रदेश नेतृत्व पर निशाना साधा है। निकाय चुनाव के नतीजों के बाद डोटासरा पर लगातार हमलावर रहे विश्वेन्द्र सिंह के खिलाफ प्रदेश कांग्रेस ने कार्रवाई की सिफारिश की थी। पार्टी कोई फैसला लेती, उससे पहले ही उन्होंने खुद पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी।
पोस्ट में क्या लिखा
विश्वेन्द्र सिंह ने लिखा कि उन्होंने जीवन में हमेशा अपने इष्ट और अंतरात्मा की आवाज सुनकर ही फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि कुछ नेताओं के बयानों से उनके कार्यकर्ताओं में आक्रोश है और वे खुद भी आहत हैं।“जिस पार्टी के लिए मैंने मेरा जीवन न्यौछावर कर दिया, आज उसी पार्टी ने यदि मेरी निष्ठा, ईमानदारी, कर्तव्य परायणता का यह सिला दिया तो मैं अंदर से बहुत हिल गया हूं।”“मेरा सार्वजनिक जीवन खुली किताब है, बेदाग है। मैंने मेरे दामन पर कभी दाग न तो लगने दिया और न ही लगने दूंगा। ऐसी परिस्थिति में दम घुटने से मरने के बजाय स्वाभिमान की मौत मरना बेहतर है।”पोस्ट के आखिर में उन्होंने लिखा — “मेरे पुरखों ने कभी ऐसी चीजों से समझौता नहीं किया, उनका अनुसरण करते हुए मैं भी आपको अलविदा कहने में ही अपनी भलाई समझता हूं। मैं शायद अब आपकी गलत रीति-नीति के साथ कदमताल नहीं कर पाऊंगा।”उन्होंने यह भी लिखा कि उनके कार्यकर्ताओं में “मौजूदा चापलूसी की परंपरा” के कारण नाराजगी है और यदि सच को सच कहना तथा गलत का साथ न देना पाप है, तो वे यह हर बार करेंगे। पोस्ट में उन्होंने राहुल गांधी, सुखजिंदर सिंह रंधावा, अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद डोटासरा और टीकाराम जूली को हैशटैग के जरिए टैग किया है।
30 सितंबर को लगाए थे रीट और आरएएस से जुड़े आरोप
इससे पहले 30 सितंबर को विश्वेन्द्र सिंह ने डोटासरा पर शिक्षा मंत्री रहते हुए रीट में धांधली कराने का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सत्ता का दुरुपयोग करके डोटासरा के बेटे, पुत्रवधू और पुत्रवधू के भाई-बहन को आरएएस के इंटरव्यू में 80-80 अंक दिलवाए गए, और सभी के समान अंक आना संदेह पैदा करता है। एक अन्य आरोप डोटासरा के बेटे के ओबीसी नॉन-क्रीमीलेयर प्रमाण पत्र से जुड़ा था।उन्होंने लिखा था कि ऐसे नेताओं को खुद इस्तीफा दे देना चाहिए या आलाकमान को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
विवाद कहां से शुरू हुआ
यह पूरा विवाद नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों के बाद शुरू हुआ। भरतपुर और डीग जिलों की 13 शहरी निकायों के कुल 415 वार्डों में कांग्रेस सिर्फ 19 वार्ड जीत सकी और दोनों जिलों में पार्टी का एक भी बोर्ड नहीं बना। निर्दलीय 262 वार्ड जीतकर सबसे आगे रहे और भाजपा को 131 वार्ड मिले।
| क्षेत्र | वार्ड | निर्दलीय | भाजपा | कांग्रेस |
|---|---|---|---|---|
| भरतपुर (7 निकाय) | 235 | 152 | 66 | 15 |
| डीग (6 निकाय) | 180 | 110 | 65 | 4 |
| कुल (13 निकाय) | 415 | 262 | 131 | 19 |
हार के लिए विश्वेन्द्र सिंह ने डोटासरा के साथ-साथ भरतपुर जिलाध्यक्ष दिनेश सूपा और डीग जिलाध्यक्ष राजीव चौधरी को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने कहा था कि प्रदेश अध्यक्ष “मूक-बधिर बना बैठा है” और जनता दोनों जिलाध्यक्षों तथा डोटासरा को “कब्र में दफनाने” को तैयार है। अगले दिन उन्होंने डीग के पांच वार्डों के वोट गिनाकर टिकट वितरण पर सवाल उठाए थे।डोटासरा ने 1 अक्टूबर को इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि इस समय ऐसी बातों में उलझने का वक्त नहीं है और “हम सब एक हैं”। उनके समर्थन में आए कांग्रेस नेताओं ने विश्वेन्द्र सिंह की मंशा पर सवाल उठाए थे।

विश्वेन्द्र सिंह का राजनीतिक सफर — 1989 से अब तक।
चार दशक की राजनीति, कई बार बदले पाले
विश्वेन्द्र सिंह भरतपुर के पूर्व राजपरिवार से आते हैं और उनका राजनीतिक सफर तीन दलों से होकर गुजरा है। 1989 में वे जनता दल के टिकट पर भरतपुर से सांसद बने। 1993 में कांग्रेस के टिकट पर नदबई से विधायक चुने गए। इसके बाद 1999 और 2004 में भाजपा के टिकट पर दो बार भरतपुर से सांसद रहे।2008 में कांग्रेस के टिकट पर डीग-कुम्हेर से चुनाव लड़े और हार गए। 2013 और 2018 में इसी सीट से कांग्रेस विधायक बने। 25 दिसंबर 2018 को अशोक गहलोत सरकार में पर्यटन एवं देवस्थान मंत्री बने।जुलाई 2020 में सचिन पायलट खेमे की बगावत के समय वे मानेसर जाने वाले विधायकों में शामिल थे। 14 जुलाई 2020 को उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया। इसके बाद 21 नवंबर 2021 के मंत्रिमंडल फेरबदल में वे दोबारा कैबिनेट मंत्री बने और दिसंबर 2023 तक पद पर रहे।2023 के विधानसभा चुनाव में वे डीग-कुम्हेर से भाजपा के डॉ. शैलेश सिंह से 7,895 वोट के अंतर से हार गए थे। शैलेश सिंह को 89,063 और विश्वेन्द्र सिंह को 81,168 वोट मिले थे। यानी इस समय वे विधायक नहीं हैं — 2008 में भी उन्हें शैलेश सिंह के पिता डॉ. दिगंबर सिंह ने इसी सीट पर हराया था।
अब आगे क्या
चूंकि विश्वेन्द्र सिंह इस समय विधायक नहीं हैं, इसलिए पार्टी छोड़ने पर दल-बदल कानून के तहत सदस्यता जाने जैसा कोई सवाल नहीं है। उन्होंने अपनी पोस्ट में यह नहीं बताया कि वे आगे किसी दूसरे दल में जाएंगे या नहीं।यह घोषणा ऐसे समय आई है जब कांग्रेस आगामी पंचायतीराज चुनाव की तैयारी में जुटी है और टिकट वितरण का सवाल फिर सामने आने वाला है। विश्वेन्द्र सिंह की घोषणा पर प्रदेश कांग्रेस की ओर से औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।
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