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क़लमकार: नसीराबाद के बाद अब अजमेर में पत्रकारों से अभद्रता

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March 19, 2021

कुछ मनचले वक़ीलों ने पुलिस, महिलाओं और पत्रकारों को बनाया निशाना

नसीराबाद के बाद अब अजमेर में पत्रकारों से अभद्रता



कुछ मनचले वक़ीलों ने पुलिस, महिलाओं और पत्रकारों को बनाया निशाना



पत्रकार अभी भी पूरे वक़ील समुदाय की जगह कुछ वक़ीलों के ही विरुद्ध



अनुभवी वक़ील समझौते की कर रहे हैं कोशिश



सुरेन्द्र चतुर्वेदी



नसीराबाद के पुलिस थाने में एक पत्रकार के साथ अभद्रता हुई। ज़िला पुलिस कप्तान को दिए गए ज्ञापन की स्याही अभी सुखी भी नहीं थी कि अजमेर में कुछ इच्छाधारी वकीलों ने पत्रकारों की गुद्दी पकड़ ली। पुलिस वालों के साथ गाली-गलौज़ की, बस को रोकने के बाद उसे जलाने की धमकी दे डाली, गुज़रती महिला को रोककर उसके साथ भी अभद्रता में कोई कमी नहीं छोड़ी।



ये वे आरोप हैं जो पत्रकारों ने पुलिस कप्तान जगदीश चंद शर्मा को दिए ज्ञापन में लगाए हैं ।



पत्रकार प्रजातंत्र की पहली प्राथमिकता माने जाते हैं। वे नाज़ुक वक़्त के निगेहबान माने जाते हैं। दूसरी तरफ वक़ील भी प्रजातंत्र के जागरूक स्तंभ कहे जाते हैं ।न्याय के पुजारी और आम आदमी की आवाज़ के रक्षक!! कहा तो यह भी जाता है कि वक़ील और पत्रकारों के बीच चोली दामन का साथ होता है ,मगर कल जो घटना अजमेर में हुई उससे लगा कि दामन ने चोली पर हाथ डाल दिया है।



पत्रकारों ने वक़ीलों पर आरोप लगाने में अतिरिक्त सावधानी बरती। मुझे खुशी है की मुट्ठी भर वक़ीलों द्वारा की गई अभद्रता को पत्रकारों ने पूरे वक़ील समुदाय की हरक़त नहीं बताया।



उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अजमेर के पूरे वक़ील समुदाय से उनको कोई शिक़ायत नहीं ।वक़ीलों की भीड़ में कुछ ऐसे थे जिन्होंने वक़ील होने पर ही दाग लगा दिया।



पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन देने वालों में जागरूक और प्रखर वक्ता माने जाने वाले पत्रकार मनवीर सिंह चुंडावत दोषी वक़ीलों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग कर रहे थे।




यहां मैं बता दूं कि मनवीर सिंह के सगे भाई गजवीर सिंह जी स्वयं भी लोकप्रिय वक़ील हैं। वक़ीलों के अनुशासन को मनवीर सिंह भली भांति जानते हैं । भाषा की मर्यादा और संयम उन्होंने अपने वक़ील भाई गजवीर सिंह जी से ही सीखा है।



उल्लेखनीय यह भी है कि मनवीर सिंह ऐसे पत्रकार हैं जो वक़ीलों के हर आंदोलन में उनके साथ खड़े नज़र आते रहे हैं ।उस समय भी जब वक़ीलों को पुलिस ने कलेक्ट्रेट में खदेड़ कर मारा था। कई वकील जब घायल हो गए थे।



वक़ील जो पेशे से ख़ुद अपनी ज़ुबान होते हैं मगर अजमेर के पत्रकारों ने हमेशा वक़ीलों की ज़ुबान को अपनी क़लम बनाया है। इस बार कुछ वक़ीलों ने जो किया उसे पत्रकार जगत भूल नहीं पाएगा ।



मैंने जब वक़ील समुदाय से इस घटना के बारे में बात की तो 90% वकीलों ने स्वीकार किया कि जो हुआ अच्छा नहीं हुआ ।चोली दामन का साथ ही नहीं छूटा बल्कि चोली ही फट गई।ज़िम्मेदार वक़ीलों का मानना है कि कुछ समझदार अनुभवी वक़ील इस दिशा में पहल करते हुए पत्रकारों को मनाने का प्रयास करेंगे। उन्हें यक़ीन है कि पत्रकार ज़िद्दी नहीं होते। समझाने पर कुछ वकीलों की ग़लती को नज़रअंदाज़ कर देंगे ।जो ऐसा सोच रहे हैं मैं उनकी सराहना करता हूँ।



मैं नहीं जानता कि दोषी अपनी हरक़तों के बारे में क्या सोचते हैं मगर यदि वे ज़रा भी मानवीय समझ और संवेदना रखते हैं तो पत्रकारों के साथ हुई अभद्रता के लिए क्षमा याचना कर लेंगे ।दरार बढ़ाने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि बिना पत्रकारों की मदद से कोई भी आंदोलन या लड़ाई ज्यादा वक़्त तक क़ायम नहीं रह पाती।



पत्रकारों ने साफ़ कर दिया है कि वे अब वक़ीलों के किसी भी आंदोलन का कवरेज़ नहीं करेंगे ज़ाहिर है बिना कवरेज़ के आंदोलन की धार कभी तेज़ नहीं होगी।



मुझे ख़ुशी है कि कुछ वयोवृद्ध और प्रबुद्ध वक़ील इस दिशा में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं ।बार के चुनाव सामने हैं ।चुनाव में कई वक़ील अपना काला चोगा उतारकर नेतागिरी चमकाने में लग जाते हैं। इस बार उनकी नेतागिरी से पत्रकार चमक गए हैं ।



जो वीडियो क्लिप्स पत्रकारों के पास है उनसे साफ़ ज़ाहिर है कि कुछ वक़ीलों ने वाक़ई आपा खो दिया था। ऐसे वकील जांच में तो नामज़द हो ही जाएंगे मगर अच्छा हो यदि वे स्वयं अपने आपको, अपने आगे आईना रख कर देख लें। महसूस कर लें कि उनसे कहाँ, क्या गलती हो गई  ग़लती स्वीकार करना या की गई ग़लती के लिए माफ़ी मांग लेना भी बहादुरी ही होती है ।ग़लती के बावजूद ज़िद की सूली पर लटके रहना कायरता कही जाती है ।



कुछ वकीलों को पूरे समुदाय की इज़्ज़त के लिए यदि पत्रकारों से माफ़ी भी मांगनी पड़े तो यह न्यायोचित होगा।



धर्म युद्ध में विजय सत्य की ही होती है ।सत्य उस सूरज की तरह होता है जिसे बदली कुछ समय के लिए ढक तो सकती है, मगर मिटा नहीं सकती ।



मुझे यह कहते अच्छा लग रहा है कि अजमेर के पत्रकारों ने वक़ीलों के प्रति ग़ुस्सा तो ज़ाहिर किया है, लेकिन आपा नहीं खोया है। उन्होंने पत्रकारों और वक़ीलों के बीच की लड़ाई में समझौते की स्पेस अभी भी छोड़ रखी है ।लड़ाई को कुछ वकीलों तक ही सीमित रख रखा है ।बड़ा दिल दिखाया है उन्होंने । अब वकीलों को बड़ा दिल दिखाने की बारी है ।




मुझे यकीन है रिश्तों के बीच की दरारें ,दिल की दरारों को बचा लेंगी। वकीलों को इस दिशा में सार्थक पहल करनी चाहिए ताकि रिश्ते चोली दामन के ही बने रह सकें।



बाक़ी तो यही घोडे यही मैदान।


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