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अंदाजे बयां: मैं जब ख़ुद को ढूँढ रहा था

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January 11, 2021

हर जानिब सोना बिखरा था

मैं जब ख़ुद को ढूँढ रहा था,

हर जानिब सोना बिखरा था।



उठा रहा था काँच के टुकड़े,

तू जब मुझको छोड़ गया था।




हर इक पेड़ के पीछे था मैं,

जिस रस्ते से तू गुज़रा था।




मेरा रिश्ता नज़र में तेरी,

रात में उतरा इक कपड़ा था।




तेरी तरह फिर उग न सका मैं,

जड़ों से अपनी मैं उखडा था।




तेरे मेरे बीच उम्र भर,

अपनापन तो कब सोया था।




जन्मजात इक गूँगा मुझमें ,

आँखों से कुछ बोल रहा था।




सुरेन्द्र चतुर्वेदी


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