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January 6, 2021
पूरा जंगल बाहों में भर कर देखूँ,
एक बार तो मैं भी अपना घर देखूँ।
कट जाए न उम्र धूप में चलते हुए,
कभी तो चाँद सितारों का मंज़र देखूँ।
किसी हाथ में कभी तो देखूँ गुलदस्ता,
हर इक हाथ में कब तक मैं पत्थर देखूँ।
कभी तो मुझको पढ़ना लिखना आ जाए,
कभी तो तेरा नाम कहीं लिखकर देखूँ।
मंदिर मस्जिद मयखाने सब एक से हैं,
अमृत ,ज़मज़म,या शराब चख कर देखूँ।
अपनी उड़ानों पर यक़ीन भी आ जाए,
आसमान के क्या है जब ऊपर देखूँ।
करता हूँ ईमान की बातें दिन भर ही,
कभी तो मैं नेज़े पे अपना सर देखूँ।
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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