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क़लमकार: हम सब डंडे का ज़ोर ही समझते हैं

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November 18, 2018

मेरे एक मित्र सिंगापुर गए वे वहां की बात बता रहे थे।

रात के दो बजे खाली सड़क पर दो युवतियां सड़क पार करने के लिए हरी बत्ती का इंतज़ार कर रही थीं। सड़क पर यातायात बिल्कुल नहीं था बावजूद इसके वे लड़कियां हरी बत्ती होने का इंतज़ार करती रही।

इसे उस देश का कल्चर और अनुशासन ही कहा जाएगा जो उन्हें बचपन से सिखाया जाता है।

एक हम हिन्दुस्तानी हैं कि लाल बत्ती होने पर भी सिग्नल तोड़ कर भाग छूटते हैं।

कारण ना तो हमें कभी यातायात के नियमों का पालन करना सिखाया गया है और ना ही अनुशासन।

कुछ मेट्रो शहरों को छोड़ दें तो सिग्नल तोड़ने पर कोई कार्रवाई भी नहीं होती जो इस तरह के कृत्य करने वालों को बढ़ावा देती है।

यातायात कर्मचारी कम हैं जो हैं वे उगाही में लगे रहते हैं।

इसका एक ही उपाय समझ आ रहा है आनेवाली नई पौध को हम छोटी उम्र से ही यातायात नियमों का पालन करना स्कूली पाठ्यक्रम में सिखाएं पर मौजूदा लोगों को तो डंडे के ज़ोर से ही सिखाना होगा।

सरकार को मेरी सलाह है कि जितना खर्च वह यातायात कर्मचारियों की भर्ती पर करे अगर उसका एक चौथाई सी सी टी वी कैमरों पर खर्च करे तो सरकार को ना केवल इन कैमरों की लागत वापस मिल पाएगी अपितु राजस्व भी हासिल होगा।


देश का आम नागरिक कोई भी काम बिना डंडे के डर के करता ही नहीं है इसीलिए डंडा चाहे वह किसी भी रूप में हो आवश्यक है।

जयहिंद।

राजेन्द्र सिंह हीरा

       अजमेर


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