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October 23, 2022
पुष्कर की पहचान कहे जाने वाले रबड़ी के मालपुए अब बढ़ती महंगाई की बीच भी ग्लोबल होते जा रहे है ।एक ओर जहा देशी विदेशी पर्यटक पुष्कर आकर इनका स्वाद ले रहे है तो वही अब देश भर में इनका निर्यात शुरू हो गया। बदलते वैश्विक दौर में अब गुणवत्ता पूर्वक पैकेजिंग कर महानगरों में भेजा जा रहा है । कस्बे में 90 वर्षो से मालपुओ का निर्माण कर रहे ।राधे जी प्रतिष्ठान के मुकेश जाखेटिया बताते है कि वो अपनी चार पीढ़ी से इस काम मे जूट है । मालपुआ निर्माण की पुरानी प्रकिया के तहत 100 किलो दूध को उबालकर लगभग 30 किलो रबड़ी तैयार की जाती है । जिसमे 300 ग्राम मैदा मिलाकर घोल तैयार किया जाता है । घोल को गर्म उबलते देशी घी में तला जाता है । मालपुए की सुर्ख लाल होने पर उसे पहले से तैयार इलायची ओर केसर की चाशनी में डुबो दिया जाता है । जाखेटिया ने बताया कि एक अच्छे मालपुए की पहचान उसके जालीदार स्वरूप से की जाती है । मालपुर निर्माण मैं लगी जाखेटिया परिवार की चौथी पीढ़ी के अंकुश जाखेटिया बताते हैं कि बढ़ती महंगाई असर ने मालपुआ के दामो में बढ़ोत्तरी कर दी है । फिलहाल 440 रुपये प्रति किलो के भाव से मालपुए बेचे जा रहे है । एक किलो मालपुआ में करीब 22 पीस आते है । पूरे कस्बे में 150 से 200 किलो मालपुए प्रतिदिन बेचे जाते है । अंकुश ने बताया कि अब उनके द्वारा मालपुआ ओर चाशनी को अलग अलग एयर लोक पैकेजिंग कर महानगरों में भेजा जा रहा है । जिससे पुष्कर से हजारो किलोमीटर दूर घर भेटे लोग मालपुआ का स्वाद ले रहे है ।त्योहार और पुष्कर मेले के दौरान तीर्थ नगरी पुष्कर में लाखों पर्यटकों की आवक होती है इसके चलते करीब 3 हजार रुपए किलो मालपुआ बेचा जाता है।
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